प्रार्थना

इस लोक और उस परलोक में सभी कुछ तो उस सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान ईश्वर का अंश है। सृष्टि की सभी रचनायें उनका ही तो प्रकटीकरण है, एक तरह से।

और सबसे बड़ी मूर्खता इस ज्ञान की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि इसे मानने से इनकार करना है।

दुर्योधन ने यही मूर्खता की। जो सबसे बड़ा उदाहरण है इस बात का। ईश्वर के समक्ष होने के बावजूद उसने उन्हें नही चुना, और जो हुआ हम सब जानते हैं। हम भी जब परमात्मा पर अथवा उनकी दिव्य योजना पर विश्वास नही करते हैं तो सब कुछ होते हुए भी कौरवों की तरह हार जाते हैं।

और अगर अर्जुन की भाँति अपने अच्छे बुरे और अपने जीवन रथ की बागडोर ईश्वर को सौंप देते हैं तो कभी भी किसी तरह की निराशा का या असफलता का सामना नहीं करना पड़ता है।

इसीलिए उंनको निरन्तर स्मरण करते हुऐ, उन पर पूर्ण श्रद्धा रखते हुए, अपनी जिम्मेदारियों तथा अपने कर्त्तव्यों का यथोचित रीति से पालन करते रहना ही प्रार्थना है।

ईश्वरेच्छा को जीवन संचालन का केन्द्र बनाना यानी के अपनी समझ बुझ और अपने पूरे सामर्थ्य से प्रयत्न करके ये कहना कि -‘‘हे ईश्वर ! आपकी इच्छा पूर्ण हो – असल मे प्रार्थना है।

मेरे आराध्य प्रभु से प्रार्थना है कि आपकी शारीरिक शक्ति, साहस, पुरुषार्थ, सूझबूझ, बुद्धिमता में निरन्तर वृद्धि हो। सब प्रकार की अमंगलजनक परिस्थितियाँ टलती रहें। आपकी प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता में तेजी से बढ़ोतरी हो। आपके चारों तरफ सुख, संतोष, प्रगति, हंसी-खुशी एवं मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्यों की भरमार बनी रहे। मंगल शुभकामनाएं 💐

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