मन के अनुकूल हो तो हरि कृपा और मन के विपरीत हो तो हरि इच्छा।

ये सत्य हम सब जानते हैं कि जो इस ब्रह्मांड के रचियता हैं उन्होंने ही हमे भी रचा है। ये जो आवागमन का खेल चल रहा है, जिसे आप अपना खेला समझ रहे हैं उसे खेलने वाला कोई और ही है।

उनका ये खेल आपके आने या होने से पहले भी चल रहा था और आपके जाने के बाद भी अविराम चलता रहेगा। इसलिये किसी भी अल्पकालिक बात पर आपका अहंकार करना या गुस्सा करना व्यर्थ है। समझे कि नही?

आप को तो सिर्फ ये चुनना ही कि इस खेल में आप उनकी तरफ से खेल रहे हैं या उनके विरोध में – उनके प्रतिद्वंद्वी के रूप में उनकी ईच्छा के विरोध में। आपके लिए क्या सही है – क्या ये स्वतः स्पष्ट होने वाली या समझ मे आने वाली बात नही है?

आप अपने पूरे सामर्थ्य और योग्यता से जो जगह आपको
मैदान में मिली है वँहा खेलें, पूरी जान लगा दें। उनके जैसे (गुणस्वरूप की बात कर रहा हूँ) खेलना और उनकी खुशी के लिये खेलना ही उनकी प्रार्थना भी है और हमारा कर्त्तव्य भी।

हमारा अपने खेल (जीवन) के प्रति सदैव उत्साही और आनंदित बने रहना ही उनकी कृपा और उनके अनुग्रह के प्रति आदर और कृतज्ञता व्यक्त करना है।

मेरे आराध्य प्रभु से आज प्रार्थना है कि आप को अपने बेकार के अहंकार से, अकड़ और कर्कशता से जल्द ही छुटकारा प्राप्त हो और आपके प्राकृतिक गुणों – यानी के सहजता, सरलता, विनम्रता, निश्छलता और आपकी विनयशीलता की महानता का प्रकाश न सिर्फ इस जगत में बल्कि दूसरे लोकों में भी जल्द ही फैल जाये।

मन के “अनुकूल” हो तो “हरि कृपा” और “मन के विपरीत” हो तो “हरि इच्छा” – ये सिद्धांत और ये तथ्य आप जल्द ही अपने जीवन मे पूर्ण रूप से धारण कर लें, ऐसी भी मेरी आज उनसे प्रार्थना है।

मंगल शुभकामनाएं 💐

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