प्रार्थना।

जिस प्रकार वृक्ष बीज में स्थित है तथा बीज वृक्ष में, उसी प्रकार हम में से कोई भी श्री हरि से शुन्य नहीं है। परमात्मा सभी में पूर्णाता से विराजमान हैं।

बस मानने और समझने की बात है। आप स्वयं ही चैतन्य हो, दृष्टा हो, सच्चिदानंद हो–सत् हो, चित् हो, आनंद हो। आपके जीवन का अस्तित्व और उसकी समग्रता ही उनकी पहचान है।

उनकी प्रार्थना का एक अर्थ शायद अपने आत्मस्वरूप का अनुभव करना है, निरन्तर आत्म चिंतन करना है, अपनी भूमिका, अपने कृत्यों, हरकतों, व्यवहार और प्रक्रियाओं पर दृष्टि बनाये रखना है।

अपने शरीर को स्वस्थ रखना, मन को शांत बनाये रखना और ह्रदय को हर्षित रखना प्रार्थना है। अपने शुभ कृत्यों से निरन्तर खुशी, प्रसन्नता और आनंदोल्लास पैदा करना भी उन्ही की प्रार्थना करना है। अपनी वास्तविक प्रतिभा के अनुसार बराबर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते रहना भी उनकी प्रार्थना करना है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ की आप सफलता की ओर दिनोंदिन बढ़ते चले जायें, आपके हर पल और हर दिन में खुशियों की बहार बनी रहे तथा आपके आदर, सम्मान, सौभाग्य एवं आपकी प्रतिष्ठा में दिनों दिन वृद्धि हो।

मेरी उनसे आज ये भी प्रार्थना है की आने वाले अगले कुछ हफ्तों में आपके विचार, भावनायें और कार्य आपको सभी सीमाओं के परे ले जाएं, आपकी नई छवि, व्यक्तित्व तथा आपके सर्वश्रेष्ठ संस्करण का तेजी से निर्माण हो।

आप को शतायु, स्वस्थ और सानन्द जीवन के लिये ढेर सारी मंगल शुभकामनाएं 💐

मेरी बातों और विचारों को प्रेम और शांति से पढ़ने के लिये, मेरे ब्लॉग का अनुसरण करने के लिये मैं अनगृहीत हूं। मेरे प्रणाम, धन्यवाद तथा वंदन को स्वीकार करें।

अंत में सदा की भाँति मैं आप सबके भीतर विराजमान अपने परमात्मा को प्रणाम करता हूं 🙏

2 Comments on “प्रार्थना।

  1. विष्णु जो जगत के पालक है फिरभी भुखमरी है।लक्ष्मी की कृपा सिर्फ गलत रास्ते पर जाने वालों पर होती है

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