रविवारीय प्रार्थना – स्वयं अपने हाथों से अपने दुर्भाग्य का निर्माण क्यों करना?

दोस्तो हमारा जीवन पहले से ही एक युद्ध है- संघर्ष है। स्वयं के साथ – परिस्थितियों के साथ तरह तरह के संघर्षों और युद्धों को रोजमर्रा के जीवन मे हर कोई लड़ ही रहा है। यंहा कौन है जिसका जीवन किसी न किसी संघर्ष की कहानी नही है।

फिर हमें स्वंय पर और दूसरों पर और अधिक युद्ध क्यों थोपने हैं? अपने हाथों से अपने जीवन को पहले से अधिक जटिल और कठिन क्यों बनाना है? 🤔

अहंकार से भर कर दूसरे को नीचा दिखाना – नुक्सान पहुंचाना, जबरदस्ती अपनी प्रभुता मनवाना तथा अशुभ, निकृष्ट विचारों मे और कार्यों में रुचि रखना हमेशा ही दुख, दारिद्रय, अमंगल तथा अशांति पैदा करते हैं। अपने धर्म और अपने असली कर्मों (कर्तव्यों – जिम्मेदारियों) से विमुख हो कर हम स्वयं अपने दुर्भाग्य का निर्माण करते हैं।

हर रोज घंटों-घंटों हाथ जोड़े – आंखे बंद किए खड़े रहे, प्रवचन सुनें, प्रार्थनाएं कीं, ध्यान और साधना के उपक्रम किए, फिर भी अगर अपने कर्मों का, अपने स्वधर्म का, अपनी मूर्खता, अनभिज्ञता, अज्ञानता का आभास नही हुआ, लोभ-धूर्तता और क्षुद्रता-नीचता खत्म नही हुई, अहंकार समाप्त नही हुआ, स्वयं में और दूसरों में समाहित ईश्वरतत्व का अनुभव नही हुआ तथा अगर जीवन सरलता, सहजता और आनंद से नही भरा तो समझना चाहिए कि सारी पूजा-प्रार्थना मात्र ढ़ोंग था और कुछ भी नही।

इसलिये जो अदभुत समय हमें उपहार स्वरूप इस संसार मे मिला है इसके हर पल कोअपने सौभाग्य के निर्माण में लगाना, अपने घर संसार को सुंदर बनाने और इसे सँवारने में लगाना, स्वंय को उत्कर्ष बनाने और अपनी पूर्णता-श्रेष्ठता हासिल करने में लगाना और लगाये रखना ही परमेश्वर की सबसे उच्च प्रार्थना है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ की आपको अपनी अभिव्यक्ति, अपने विचारों, अपनी बातों, गतिविधियों, क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के प्रति सचेत बनाये रखें क्योंकि यही सब कालांतर में आपका भाग्य बनकर बार बार लोटते रहते हैं।

आपके सभी युद्ध समाप्त हो जाएं, आपके चारों तरफ चिरस्थायी शांति और अमन चैन स्थापित हो जाये तथा आपकी महानता और सफलता का युग जल्द ही आरंभ हो – ऐसी सभी कामनाओं के साथ साथ मैं अपने प्रभु जी से ये भी प्रार्थना करता हूँ आपके प्रत्येक शुभ संकल्प और कार्य जल्द ही पूर्ण हों – सिद्ध हों जायें। मंगल शुभकामनायें 💐

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