रविवारीय प्रार्थना – प्रार्थना में हम जिस परमेश्वर को संबोधित करते हैं, हम मानते हैं कि वो उपस्थित हैं, सक्रिय भी हैं और हमें देख सुन सकते हैं।

मेरा मानना है कि प्रार्थना केवल अपनी उच्चतम चेतना को जाग्रत करने का, ईश्वर की उपस्थिति तथा उनकी समीपता को महसूस करने की हमारी एक बुनियादी धार्मिक प्रक्रिया है – अभ्यास है।

प्रार्थना में हम जिस परमेश्वर को संबोधित करते हैं, हम मानते हैं कि वो उपस्थित हैं, सक्रिय भी हैं और हमें देख सुन सकते हैं। इसीलिए तो प्रार्थना में हम अपने आराध्य से दिल और दिमाग से जुड़ने का प्रयास करते हैं – उनके साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश करते हैं। जब हम अपनी जरूरतों और इच्छाओं को उनके सामने व्यक्त करते हैं तो मानते ही हैं कि वो उन्हें सुन रहे हैं और उन्हें पूरा कर देंगे।

लेकिन जब हम अपने दैनिक कार्य करते हैं, दुसरो से व्यवहार करते हैं, लेन देन करते हैं, या जो भी हम रोज़मर्रा में सोचते हैं, बोलते हैं, करते हैं तब हम ईश्वर की उपस्थिति को नकार देते हैं, हमारा समझदार दिमाग उनके होने की इस बात को मिथ्या-मनगढ़ंत मानने लगता है। क्योंकि अगर हम ईश्वर को समक्ष रख कर कुछ भी कहेंगे, करेंगे तो जानबूझकर कुछ भी गलत कैसे कर सकेंगे।

अगर ये बात दिमाग मे रहे कि ईश्वर सब जगह हर किसी जीव में मौजूद है और हर समय हमे सुन देख पा रहा है तो फिर दुष्कर्म, अधर्म और दुराचार कैसे होंगे। फिर हमारे हाथों से किसी का बुरा या नुक्सान कैसे होगा। फिर हम से कुटिलता, नीचता और स्वार्थ भरा कार्य कैसे होगा।

हम अपनी प्रार्थना-साधना के फलस्वरूप परमात्मा के दर्शन प्राप्त कर सकेंगे या नही ये मैं नही जानता हूँ, मगर वो हमें हर पल देख सुन पा रहे हैं, हमारे साथ हैं, अगर ये अहसास और ये भान नियमित रूप से हमे बना रहे तो हमारी पूजा प्रार्थना सफल हुई, उन्हें मान्य हुई – ये मानना चाहिये।

इसीलिये उन्हें सब जगह हाज़िर-नाज़िर मान कर अपनी उच्चतम भावना के साथ छोटे से छोटा कार्य करना, अपने कर्तव्यों – अपनी प्रतिबद्धताओं का श्रद्धा, समर्पण और निष्‍ठा से पालन करना ही दैनिक जीवन मे उनकी सर्वोच्च प्रार्थना है।

प्रार्थना आपकी दिनचर्या का केवल औपचारिकता के रूप में छोटा सा हिस्सा नही होना चाहिये बल्कि आपकी पूरी दिनचर्या ही एक प्रार्थना होनी चाहिए, यानी के आप जो भी दिन भर में कहते करते हैं वो सब ही सब उनके सम्मान में – उनको ही समर्पित है इस भाव से करना चाहिये – यही सच्ची प्रार्थना है, और केवल इसी प्रक्रिया से हम उन तक पहुंच सकते हैं।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि आपके विचारों, भावनाओं, व्यवहार तथा दैनिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं में उत्कृष्टता, शुचिता, भद्रता, साधुता तथा पुण्यात्मा होने के सभी गुणों का समावेश हो जाये जिससे आपकी इहलौकिक तथा पारलौकिक अनुकूलताओं का तेजी से सृजन हो पाये।

उनका आशीष आप सब पर अनवरत बना रहे, वे सदैव आपके साथ रहें और उनका संरक्षण व मार्गदर्शन आपको सदैव प्राप्त रहे, ऐसी सब मंगलकामनाओं के साथ साथ मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से ये भी प्रार्थना करता हूँ कि आपका जीवन और घर आंगन हर्षोल्लास के रंगों से सदा सराबोर रहे। मंगल शुभकामनायें।

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