रविवारीय प्रार्थना – अगर इस लोक के स्वर्ग से चुके तो परलोक में भी जरूर चूकेंगे…

अधिकतर लोग इस आशा में अपना जीवन जीते रहते हैं कि मरकर उन्हें स्वर्ग मिलेगा। एक बात बतायें की जिसे जीते जी स्वर्ग नही मिला, वह मरकर कैसे पा लेगा और पा भी लिया तो किस काम का? जो जीते जी चूक गया वो मुर्दा होकर क्या पा लेगा? अपनी समझ से तो बाहर है।

पुण्यात्मा का स्वर्ग यंही है, अभी है, वो जंहा है जीवंत है उसका अपना स्वर्ग उसके चारों ओर है। उसे कंही भी भेज दो वो वंही अपने स्वर्ग का निर्माण कर लेगा। पुण्यात्मा अपना स्वर्ग अपने साथ लेकर चलते हैं। पुण्यात्मा से मेरा मतलब है उन लोगों से है जिनकी प्रवृत्ति शुभ है, जो होश की जिंदगी जी रहे हैं, जिनका प्रत्येक कृत्य सत्कर्म है, सुनियोजित है, सुविचारित है और जानते बुझते हुए किया गया है – अनजाने में नहीं किया गया और पाखण्ड और किसी को धोखा देने के लिये तो बिल्कुल नही किया गया है।

और यही बात पापात्मा पर भी लागू होती है। उसे स्वर्ग में भी भेज दो, तो वो अपनी गलत इच्छाओं और निकृष्ट महत्वकांक्षाओं की वजह से, नीची सोच या अनुचित लोभ लालच की वजह से अवांछनीय, निंदनीय और अपने मैले विचारों और दुष्ट कर्मो से उसे नरक बना देता है। ऐसे लोग करते करते इतने क्लेश बढ़ा लेते हैं कि अंत मे उन्ही में उलझ कर बुरी तरह से मर खप के नष्ट हो जातें हैं।

हम सब देवता, ऋषि और सम्राट होने की क्षमता लेकर पैदा हैं, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए पैदा हुए हैं और धीरे धीरे क्या बनते चले जाते हैं हम सब जानते हैं। हम सब में बीज तो आम के फल का है और बन जाते हैं बबूल का पेड़। अगर हम वो न हो पाए, बन पाये जो हम हो सकते थे तो हमारे अतिरिक्त कोई और जिम्मेवार नहीं है। ये समझ लेना है।

इसलिये मेरा मानना है कि भले ही कोई बहुत सी संहिता कंठस्थ कर ले, दिन रात पूजा पाठ में लगा रहे, लेकिन अहंकार वश या प्रमादवश अगर उनमें कहि हुई बातों का अनुसरण न करे, उन पर आचरण न करे तो वह सिर्फ दूसरों की गांय गिनने वाले ग्वाले के समान है। केवल चराने के लिये ले जाने से ग्वाला उन गायों का दूध दही माखन प्राप्त करने का अधिकारी नही बन जाता है। उम्मीद है ये उदाहरण समझ आया होगा।

कुछ भी सिर्फ जान लेने से पुण्य का कोई संबंध नहीं है। उसका केवल जीने से संबंध है। किसी भी जानकारी का अमल में लाने से पूण्य का संबंध है। बस यही समझ बनाये रखना प्रार्थना है। सदैव सत्कर्मो में संलग्न रहना प्रार्थना है। प्रबुद्ध आत्मा की तरह सरलता और सहजता से नीतिगत, नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं, अपने कर्तव्यों और प्रतिबद्धताओं का पालन करते रहना प्रार्थना है।

जो लोग मन, वाणी और शरीर से धर्म के विरुद्ध यानी के पाप कर्मों में संलग्न रहते हैं वे परलोक की तो छोड़ो इस लोक के भी असली महोत्सव से वंचित रह जाते हैं। पापी के जीने का ढंग ही ऐसा हो जाता है कि वो धरती के उस पहले से ही मिले हुए स्वर्ग से भी चूक जाता है जंहा आसमानी देवता भी आने को तरसते रहते हैं। और एक बात पक्की है कि जो इस लोक में स्वर्ग से चूक जाता है वह परलोक में भी जरूर चूकेगा।

आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि आपकी अनुकूल और सौमनस्य कामनाओं में वृद्धि हो, आपके सतकर्मों में, सद्बुद्धि में, बड़प्पन में और भद्रता में बढ़ोतरी हो। आपके सौभाग्य में, आपकी उत्कृष्टता और व्यापकता में वृद्धि हो और सभी शुभ प्रयास और संकल्प तेजी से फलीभूत हों। आपका जीवन और भाग्य आपके विचारों और कार्यों की वजह से चमक उठे।

आपके उत्तम स्वास्थ्य और प्रसन्नचित मनोदशा की मंगलकामनाओं के साथ साथ मैं आज प्रभु जी से ये भी प्रार्थना करता हूँ कि आपके जीवन और घर आंगन में प्रेम-स्नेह, हास-परिहास तथा खुशहाली के सभी रंगों की भरमार सदैव बनी रहे। मंगल शुभकामनाएं 🙏

श्री रामाय नमः। श्री राम दूताय नम:। ॐ हं हनुमते नमः।।

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