रविवारीय प्रार्थना – आप आगे जा रहे हैं या दिन प्रतिदिन पीछे की तरफ ???

उत्सव आत्मा का का मूल स्वभाव है और मेरा मानना ही कि ईश्वर और ईश्वरियता भी एक मायने में उत्सव है, सतत उत्सव – एक महोत्सव ही तो है।

अपने आसपास देखेंगें तो पायेंगे कि पक्षी, पशु, पेड़, पौधे, फूल, सभी अपने होने का अपने जीने का जश्न मना रहे हैं। आप चारों तरफ गौर से देखोगे तो पाओगे की फूलों में, वृक्षों में, आकाश में सब जगह ही उत्सव है प्रफुलता है, नाच है। प्रकृति में एक क्षण को भी उत्सव ठहरता नहीं है – हर जगह नाच चलता ही रहता है, झरने बहते ही रहते हैं, फूल खिलते ही रहते हैं। जरा गौर से देखो, आपको क्या कहीं भी उदासी दिखाई पड़ती है? क्या कहीं भी इस सृष्टि के विराट स्वरूप में, कहीं जरा से भी किसी कोने में कहीं आपको उदासीनता, चिंता, खिन्नता, विषाद, निष्क्रियता या उद्विग्‍नता दिखाई पड़ती है? नही, कंही भी तो नही।

आप अगर सरल – सहज और शात हो रहे हो पहले से, मौन हो रहे हो पहले से, आपके जीवन में उत्सव की थोड़ी सी भी किरण आ रही है, अंधेरा थोड़ा कम मालूम पड़ता है पहले से, दीए की लौ स्थिर होती मालूम पड़ रही है, प्रेम बढ़ रहा है, जीवन में थोड़ी गुनगुनाहट आ रही है, नाचने का मन ज्यादा कर रहा पहले से तथा जीवंतता बढ़ रही है तो समझना कि आप आगे जा रहे हो, आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहे हो। आपका जीवन भव्य, विशाल और दिव्य बनने की राह पर है, सुंदर और उत्कृष्ट हो रहा है। अगर आप ये सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महसूस नही कर रहे हैं तो यकीन मानिये की सब कुछ बदलने की – कुछ नया शुरू करने की या जो कर रहे हैं उसे बंद करने की जरूरत है।

इसलिए हम सब को सजग रहना होगा – समझना होगा और हर दिन सिंहावलोकन करना होगा कि कि हमारे मार्गदर्शक, हमारी आस्थायें, परम्पराएँ, संस्कार, विचार, आदतें तथा दैनिक गतिविधियाँ हमे आगे ले जा रहे हैं या दिन प्रतिदिन पीछे की तरफ धकेल रहे हैं???

अगर आप मे या आपके जीवन मे उदासीनता, विरक्तता, अनर्थकता, घृष्टता, ढीठता, मानापमानबोध शून्यता, धूर्तता, कुटिलता, कपटीपन, अहंकार, पाखण्ड, प्रपंच, अधीरता और असंतुष्टता बढ़ रही है तो यकीन मानना की कहीं चूक हो रही है। जिसे आप ऊपर जाना समझ रहे हैं, वह ऊपर जाना नहीं है, वो नीचे उतरना है।  आप जो पहले थे अगर वो भी आज की तारीख़ में नही रहे, समय के साथ और कठोर हो गये, संवेदनशीलता बढ़ी नहीं – घट गई, सौंदर्य का बोध बढा नहीं – नष्ट हो गया, प्रेम फैला नहीं – बल्कि खत्म हो गया, थकी-थकी सांसें, उदास पथरीलापन ले कर कोई कंहा कोई श्रेष्ठ हो सकता है? अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता है? कैसे ईश्वर का अनुभव कर सकता है? ये कंहा की उन्नति है – बल्कि जिसे आप उन्नति, बड़प्पन या उत्कर्ष समझ रहे हैं वो तो अधोगति है, अवनति है, पतन और नाश का एक रूप है।

जिसे सही ज्ञान नहीं है, उसके लिए होली दिवाली साल में एक ही बार आती है, लेकिन जो सच मे पवित्र हैं, धार्मिक हैं, पुण्यात्मा हैं, भक्त हैं, प्रबुद्ध और आध्यात्मिक हैं उनके लिए हर पल और हर दिन होली है – दिवाली है, उत्सव है।

इसीलिये मेरा ये मानना है कि जिस जिस किसी के आभा-मंडल में अंधेरा नहीं, बल्कि आकाश सा विस्तार, सूर्य की किरणें पाओ, जिस के जीवन में आप प्रफुल्लता पाओ, प्रसन्नचित्तता पाओ, पवित्रता पाओ, जिसकी गुनगुनाहट आपको उसके पास जाते ही सुनाई पड़े, जिसके पास अनूठी ऊर्जाओं का नृत्य देखो और जो आपका हाथ भी पकड़ कर अपने नाच में शामिल करने के लिये उतावला दिखे, इनसे ही पहचान करना। यही हैं जो आपको आगे ले कर जायेंगे आपका सही मार्गदर्शन करेंगे, आपके जीवन को ऊंचा उठाने में आपकी सहायता करेंगे। आपके बोध जीवन को मंदिर में प्रवेश कराएंगे, उस परमात्मा के निकट पहुंचने में आपकी मदद करेंगे जो जीवन का मूलस्रोत है – मूल धारा है।

मैं ये तो नही कह सकता हूँ कि बाकी के लोग आपको अंधेरी घाटियों में ले जा रहे हैं या वे आपको कब्र में ही उतारकर दम लेंगे, बस ये जरूर कह सकता हूँ कि वे गुरु नही हो सकते हैं और न ही वे आपको ईश्वरय अनुभव को प्राप्त करवा पायेंगे और न ही आपकी यात्रा कभी पूर्ण या सफल होने देंगे।

उत्सव से मेरा अर्थ है: धन्यवाद की अभिव्यक्ति – अपने आनंद की अनुभूति। छलकता हुआ आनंद और कृतज्ञता केवल शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन जीने के ढंग, अपने आचरण और अपनी दैनिक गतिविधियों से प्रदर्शित करना ही उत्सव है और एक तरह से हमारी प्रार्थना भी है।

अपने चित्त से सभी प्रकार की मलिनताओं को मिटाने का प्रयास, अपने विचार तथा वृतियों को ऊंचा उठाने के प्रयास, अपने जीवन में लालित्य को नित्य बढ़ाने के प्रयास, नैतिक- अनैतिक, कर्तव्य-अकर्तव्य और उचित-अनुचित में फर्क करने और लगातार अनुचिंतन करना ही प्रार्थना है। आप जो भी कार्य करते हैं, उसे बोधपूर्वक करना, दिन प्रतिदिन सरल होते जाना, प्राकृतिक होते जाना तथा अपने होने का हर क्षण उत्सव मनाना और हर क्षण उत्सवमय ढंग से जीना ही हमारी सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है।

आज मेरे आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना है कि क्षण प्रतिक्षण आपका अहोभाव बढ़ता चला जाये, आप दिन प्रतिदिन सहज, सरल, विनम्र, सौम्य और मृदभाषी होते चले जायें। आपको हर पल में उत्सव मनाना आ जाये।

मेरी उनसे आज ये भी प्रार्थना है की आपके सभी शुभ संकल्प तथा मंगल कार्य सदैव सफल हों, आपके घर-आंगन में सदैव शुभता और मांगल्य की वर्षा होती रहे तथा आपके उत्साह, आनंद और उल्लास में तेजी से वृद्धि हो। 

आप को शतायु, स्वस्थ और सशक्त जीवन के लिये ढेरों ढेर मंगल शुभकामनाएं 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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