रविवारीय प्रार्थना – कम से कम गाय जैसी उपयोगिता एवं पवित्रता तो हम में होनी ही चाहिये।

श्री कृष्ण की गो-भक्ति और हमारा गांय को मां कहने के पीछे कई कारण हैं। पर मुझे लगता है उसका प्रमुख कारण है गांय में मौजूद वत्सलता, आत्मीयता, उपयोगिता एवं ईश्वरीय गुणों की झलक।

अगर हम सारे पशु-जगत में खोजेंगे, तो पाएंगे की गाय के पास जैसी आत्मा दिखाई पड़ती है, वैसी किसी दूसरे पशु के पास दिखाई नहीं पड़ती है। गाय के नेत्रों में हिरण के नेत्रों जैसा विस्मय न होकर सदा एक आत्मीय विश्वास झलकता है। अगर हम गाय की आंखों में झांकेंगे, तो पायेंगे कि जैसी करुणा और ममता गाय की आंख में झलकती है वैसी किसी दूसरे पशु की आंख से नहीं झलकती। जैसी स्नेहशीलता, सरलता, आत्मीयता, संवेदनशीलता और जैसी उपयोगिता गाय में दिखाई पड़ती है वैसी किसी दूसरे पशु में नहीं दिखाई पड़ती है। समस्त पशु-जगत में गांय की आत्मिक गुणवत्ता साफ स्पष्ट रूप से सर्वाधिक विकसित मालूम पड़ती है।

अब महत्वपूर्ण सवाल ये उठता है कि हम से क्या दिखायी पड़ रहा है। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना होने के नाते क्या हम से ईश्वरीय या मानवीय गुणों की झलक देखने को मिलती है?? मुझे लगता है कि कम से कम गाय जितनी उपयोगिता तथा आत्मिक गुणवत्ता तो हम सब के मन, वचन और कर्म से झलकनी ही चाहिये 🤭।

परमात्मा की विशेष कृपा और अनुग्रह से आपको यह दुर्लभ मानव शरीर मिला है और यदि आप इसे प्राप्त कर के गाय जितनी भी पवित्रता, शीलता, सहजता, शुद्ध आचरण, धैर्य और दृढ़ता नही अपना पाते हैं, इन्हें अपने वचनों से और क्रमों से प्रदर्शित नही कर पाते हैं तो हमारा इस शरीर को पाना सार्थक नहीं सिद्ध हो सकता है।

उन्होंने आप को विवेक, ज्ञान और प्रज्ञा देकर सभी जीवों में श्रेष्ठ बनाया है। इन दिव्य गुणों को अपने आचरण में समावेश करते हुए सदा उपयोगी, सार्थक, अर्थपूर्ण, भद्र और नेक रह कर अपने मनुष्य धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करना ही प्रार्थना है। मन, वचन और कर्म से धार्मिक कृत्यों में संलग्न रहना ही प्रार्थना है। अपने मन में निर्मलता, विवेकशीलता और प्रसन्नता बनाये रखना तथा स्वयं को विकसित करने के लिये निरन्तर परुषार्थ करना ही प्रार्थना है।

मैं एक बार पुनः बता दूं कि श्रद्धा एवं अहोभाव से उनकी भक्ति, स्वभावतः सदाचार का पालन करना, बुद्धि में धर्मभाव रखना तथा शरीर से सदैव सत्कर्म करना ही उनकी कृपा का पात्र बनने का सबसे सरल उपाय है और इसी से हमारी वास्तविक उन्नति सम्भव है।

जो देखने सुनने मे कितना ही सुंदर और शक्तिशाली दिखे, किन्तु आचार सर्वथा भिन्न हों, स्वार्थपूर्ण हों, अथवा जिसके विचार एवं ज्यादातर कर्म छल व कपट से भरे हों और दूसरे को धोखा देने, प्रपंच रचने के उद्देश्य से हों.. वे कभी भी उनके प्रिय नही बन सकते हैं।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूँ कि आपका कठिन श्रम, दृढ़ संकल्प, सत्कर्म और सदविचारों का योग आपको उनकी कृपा का पात्र बनाए रखे और आप के जीवन में सभी प्रकार की भौतिकीय और आध्यात्मिक उच्चताएँ प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हों।

आपकी उपस्थिति की सार्थकता और उपयोगिता सदा बनी रहे, आप स्वस्थ रहें, दीर्धायु हों तथा उत्साह एवं सकारात्मक ऊर्जा से सदा परिपूर्ण रहें, यही सब कामना है उनसे। मंगल शुभकामनाएं 🙏🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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