रविवारीय प्रार्थना – आप सदैव शुभकर्म कर पाने में समर्थ हो जायें, अपने कानों से सदैव शुभवचन सुनें और आपकी आँखों के सामने सदैव सब शुभ हो….

वैदिक प्रार्थनायें चाहे जितनी भी विस्तृत और रहस्यपूर्ण हों, चाहें हमे कितनी कितनी भी कठिन लगें, उन सब मे केवल शान्ति का ही नाद सुनाई देता है। हमारे हिन्दू धर्म मे सभी वैदिक मंत्रों का सर्वोच्च लक्ष्य है – सम्पूर्ण सृष्टि में शान्ति एवं बंधुत्व। सभी सूत्रों का एक ही उद्देश्य है कि आप निरंतर उपर उठते रहें और अनंत की ओर बढ़ते रहें।

इसीलिये जो सूत्र, मन्त्र, प्रार्थनायें, पूजा – पाठ वैदिक काल मे प्रचलित थे वे आज भी उतने ही प्रासंगिकता, प्रमाणित और अनुकरणीय हैं।

हम सब जानते हैं कि अनादि काल से इस देश में केवल चित्र की नहीं, बल्कि चरित्र की उपासना की जाती रही है। इसीलिए हमारे पौराणिक ग्रन्थों में उस व्यक्ति को पूजनीय, वंदनीय बताया गया है जिसके मुख पर सदैव प्रसन्नता है, हृदय में करुणा है, वाणी में मधुरता है, कर्म शुभ एवं सर्वहितकारी हैं। बताईए ऐसा व्यक्ति किस को आदरणीय, पूज्य नहीं है? और हम ऐसे क्यों नही बन सकते हैं।?

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में संतोष को बहुत महत्व दिया गया है। ये कह गया है कि बस जो है, वही सार्थक है। जो नहीं है, उसमें क्या रखा है। जो अपने पास है, वही धन्यभाग है। और जो अपने पास नहीं है, उसमें कुछ भी रस नहीं है। अगर आप ये बात ठीक से समझो तो असंतोष में जीनेवाला मन ही नरक में जीता है। संतोष में जीनेवाला मन स्वर्ग में जीता है। क्या ये सूत्र आज भी प्रासंगिक है के नही है? क्या मन मे संतोष रख पाना बहुत मुश्किल है?

हमारे वैदिक सूत्र कहते हैं कि आप अपने विचारों से, सोच से, शब्दों से, कार्यों से दूसरों का भला चाहे न कर पाओ और चाहे उन्हें आनंदित और प्रेरित करने में भी आप भले ही समर्थ न हो, कोई बात नही। लेकिन भूल से भी ऐसी दिशा में मत जाना, जहां किसी को बिना दुखी किए आप सुखी, आनंदित या सफल हो ही न सको। हजारों हजार और उपाय हैं जीवन में सफल होने के। क्या ये बात आज भी प्रासंगिक नही है? क्या इस सूत्र को समझ पाना और जीवन मे उतार पाना बहुत कठिन है?

हमारे ग्रन्थ कहते हैं कि मन, वाणी और कर्म से जो एक होते हैं, जो भीतर और बाहर से एक हैं, वे ही भगवत्ता को प्राप्त करने के सबसे बड़े पात्र होते हैं। शायद इसीलिये मन – वचन – कर्म में एकता, भाव-शुचिता, सत-कर्म प्रीति और पूर्ण समर्पण ही हमारी प्रार्थना और साधना का सार है। विशुद्ध ब्रह्मलोक उन्हें ही प्राप्त होता है, जिनके अन्तःकरण में असत्य, छल, कपट और कुटिलता नहीं है। ये बात समझने के लिये क्या क्या उपाय जरूरी हैं, बतायें? बतायें की प्रभु की अनुकंपा का पात्र बनने के लिये ये हम इस सूत्र का अनुसरण क्यों नही कर सकते हैं।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हुँ की आपका स्वभाव सरल, कुंठामुक्त, पूर्वाग्रह से रहित, शान्त तथा सदाचरण से युक्त हो जाये, आपके मन, वचन और कर्म एक हो जायें – पवित्र और महान हो जायें।

मैं आज उनसे ये भी प्रार्थना करता हूँ कि आप सदैव शुभकर्म कर पाने में समर्थ हो जायें, अपने कानों से सदैव शुभवचन सुनें, आपकी आँखों के सामने सदैव सब शुभ हो, समस्त जीव आपको मित्र की दृष्टि से देखने लगें तथा आप समस्त प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखने मे समर्थ हो जायें, आपकी दैनिक और स्वभाविक जीवनशैली प्रार्थनामय हो जाये तथा आपका जीवन सुख शांति से भर जाये और सतत भरा रहे। मंगल शुभकामनाएं 💐

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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