रविवारीय प्रार्थना – अपना सारथि अपने मन, बुद्धि, अहं को नही बल्कि माधव को चुनना।

मुझे लगता है कि हर किसी का जीवन एक द्वंद्व है। प्रकाश और अंधकार का, प्रेम और घृणा का, अहंकार और विनम्रता का। बचपन से लेकर मृत्यु तक हम हमेशा इस द्वंद्व से घिरे रहते हैं। यह द्वंद्व अनेक सतहों पर प्रकट होता ही रहता है।

यह द्वंद्व जीवन के कण – कण में छिपा है। कौरव – पांडव और राम – रावण प्रतिपल आज भी संघर्ष रत हैं। उनका युद्ध खत्म थोड़े ही हुआ है। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति हर वक्त कूरुक्षेत्र में ही खड़ा है। महाभारत कभी हुआ और समाप्‍त हो गया, ऐसा नही, अभी भी जारी है।

इसलिए शायद कूरुक्षेत्र को भगवद्गीता में धर्मक्षेत्र कहा गया है, क्यों कि वहां निर्णय होता है – धर्म और अधर्म का। और यही निर्णय आपके मेरे भीतर होना है धर्म अधर्म का। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के भीतर हर दिन कोई न कोई निर्णायक घटना घटने को है। इसलिए हम में से किसी को भी कभी पूरी राहत कंहा मिल पाती है। कुछ भी करे, राहत नहीं है – चैन नही है मन की शांति नही है। क्‍योंकि भीतर कुछ उबल रहा है। भीतर सेनाएं बंटी खड़ी है। क्‍या होगा परिणाम, क्‍या होगी आखिर में… यही चिंता हर वक्त खाये जाती है।

दूसरी बात ये की हम में से हर किसी के भीतर अहंकार, लोभ लालच, स्वार्थपरता और घृणा के पक्ष में शायद बड़ी फौजें तैनात रहती है। नकारात्मकता के पक्ष में सदा से ही बडी शक्तियाँ रहती हैं। महाभारत में भी श्री कृष्ण की सारी फौजें कौरवों के साथ थी। केवल कृष्ण, निहत्थे कृष्‍ण ही पांडवों के साथ थे। वह बात बड़ी सूचक है। ऐसी ही हालत आज भी है। आज भी आपकी सारी शक्तियाँ अँधेरे ( नकारात्मक) के पक्ष में रहती हैं। संसार की शक्तियाँ यानी परमात्मा द्वारा दी गयी शक्तियां, योग्यतायें, कौशल, आपकी बुद्धि और क्षमतायें। सिर्फ परमात्मा ही आपके पक्ष में रहते हैं, वो भी निहत्थे। इसीलिये भरोसा ही नहीं हो पाता है कि जीत हो सकेगी – विश्वास ही नहीं बैठता कि निहत्थे परमात्मा का साथ हमें भी विजय दिलवा सकते हैं।

तीसरी बात ये की श्री कृष्ण अर्जुन के ही सारथी थे, ऐसा नहीं है, आपके मेरे रथ पर भी जो सारथी बनकर बैठा है वह भी माधव ही हैं। प्रत्येक के भीतर बैठे परमात्मा ही तो रथ को सँभाल रहे हैं। और फिर जिसका सारथि स्वयं ईश्वर हो उसकी भला हार कैसे हो सकती है, उसकी जीत सुनिश्चत है।

लेकिन हमने अपने रथ का सारथी तो स्वंय खुद को, अपनी बुद्धि को, अहं को, स्वार्थ को बना रखा है, इसलिये हार निश्चित मालूम पड़ती है, जीत असंभव।

महाभारत में अपने सामने विराट सेनाएँ सिख कर अर्जुन भी घबरा गया था। हाथ-पैर थरथरा गये थे। गांडीव छूट गया था। पसीना-पसीना हो गया था। किन्तु उसने अपना सारथी नही बदला। अगर हम भी जीवन के युद्ध में पसीना-पसीना हो जाते हो, तो आश्चर्य नहीं। लेकिन समस्या है कि हमें अपना अपना सारथी नही बदलना है।

महाभारत में कौरव पक्ष के सभी महान योद्धा पराजित हुए क्योंकि “सारथि” का चयन ग़लत था। महाभारत का नायक अर्जुन है। जीत अर्जुन की हुई थी। क्योंकि अर्जुन ने सारथि का चयन ठीक किया। अर्जुन के केवल इस एक निर्णय ने पूरी महाभारत का पासा पलट दिया था। अर्जुन निश्चल चित्त का व्यक्ति था। श्रीकृष्ण के प्रति उसकी निष्ठा पूर्ण थी, समर्पण पूरा था। यही कारण है कि उसने अपना सारथि मन, बुद्धि, अहं को नही बल्कि वासुदेव श्रीकृष्ण को चुना और फिर उनके हर निर्देश का अक्षरशः पालन भी किया।

याद रखिये की जो भी जब भी अपने जीवनरूपी रथ की डोर भगवान के हाथों में सौंप देता है, उसकी लौकिक और पारलौकिक विजय निश्चित हो जाती है।

इसीलिये हर प्रकार के अंतर्विरोध और द्वंद को खत्म करते रहना प्रार्थना है। अपने अंदर के रावण और कौरवों का हर परिस्थिति में संहार करना प्रार्थना है। प्रत्येक परिस्थिति में अपना आत्मविश्वास, धैर्य और साहस सहेज कर रखना और अपने जीवन रथ को केशव के हाथों में सौंपे रखना प्रार्थना है। श्री कृष्ण के गीता उपदेश को सही में समझ कर आत्मसात करना प्रार्थना है। कृष्णभावनामृत में रहकर ही कर्म करना प्रार्थना है।

आज मेरी अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना है कि वे आपके जीवन रथ की पताका पर सदा विराजित रह कर उसकी रक्षा करें और श्री कृष्ण सदा आपके जीवन रथ के सारथी बन कर आपके रथ को नियंत्रण में रखें और सही दिशा में ले जायें।

आज उनसे ये भी विनती है कि आपको जीवन के हर महाभारत में सफल करें और विजयी बनायें। आप सदैव स्वस्थ, प्रसन्न और दीर्घायु रहें। मंगल शुभकामनाएं 💐

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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