Manifestation • Mindset • Abundance • Blessings Your future self has brought you here. Time to Align, Attract & Evolve, Now🦸
हम सब अप्राप्त की प्राप्ति और जो प्राप्त है उसे स्थिर करने में जुटे रहते हैं और रहना भी चाहिये। यही तो योगक्षेम है और हम सब के जीवन का प्रमुख उद्देश्य भी।
लेकिन मुझे लगता है कि आध्यात्मिक मार्ग में ये बात पूरी तरह से उपयुक्त नही है। क्योंकि चाहे ईश्वर हों या ज्ञान, वो हमें कंही और से या बाहर से प्राप्त नही करना है, कोई संघर्ष या युद्ध करके पाना नही है। हम ज्ञान या ईश्वर से वंचित थोड़े ही हैं कि ये हमे किसी दूसरे से हासिल करने हैं। हम सब के सब उतने ही ज्ञान से भरे हैं उतने ही ईश्वर से भरे हैं, जितने की सब।
लेकिन जैसे धुएं से अग्नि और धूल से दर्पण ढक जाता है उसी प्रकार हमारे “मैं” से, हमारी मूर्खता और कामनाओं से हमने अपने मूल स्वरूप (आत्मा) को ढक रखा है। वास्तव में ज्ञान और ईश्वर का अभाव या अनुपस्थिति (absence) नही है बल्कि विस्मृति (forgetfulness) है।
बुद्ध को जिस दिन ज्ञान हुआ, लोग उनके पास आए और उन्होंने पूछा, आपको क्या मिला? तो बुद्ध ने कहा, यह मत पूछो; यह पूछो कि मैंने क्या खोया। वे लोग हैरान हुए; उन्होंने कहा, इतनी तपस्या, इतनी साधना, इतनी खोज क्या खोने के लिए करते थे या पाने के लिए? बुद्ध ने कहा, कोशिश तो पाने के लिए की थी, लेकिन अब जब पाया, तो कहता हूं कि सिर्फ खोया, पाया कुछ भी नहीं। बुद्ध ने कहा, वही पाया जो मुझे मिला ही हुआ था; और सिर्फ वही खोया, जो मेरे पास था ही नहीं, लेकिन मुझे मालूम पड़ता था कि मेरे पास है। जो नहीं था, उसे खो दिया है; और जो था, उसे पा लिया।
जैसे किसी चोट से या दुर्घटनावश या किसी बीमारी में हम अपना नाम और पता भी भूल जाते हैं, उसी प्रकार हम एक दुर्घटनाग्रस्त स्थिति में हो गए हैं और जो सबसे पास है जो हमारा मूल स्वरूप है जो हमारे भीतर हर वक्त मौजूद हैं उसे भूल जाते हैं। परमात्मा और ज्ञान बस एक पुनःस्मरण (remembering) है।
वास्तव में हमने न तो ईश्वर को कभी खोया ही था और न ही हम में कोई ज्ञान की कमी है। हम कहीं भी चले जाएं और हम कैसे भी पापी हो जाएं और कितने भी अज्ञानी और कितना ही अंधेरा और जिंदगी कितने ही धुएं में घिर जाए, तो भी हमारे भीतर जो ईश्वरतत्व है, ज्ञान है वह खोता नही है। उसके खोने का कोई सवाल ही नहीं है।
इसीलिए मेरा मानना है कि अपने मन के दर्पण से घुल हटा लेना प्रार्थना है, हमारी आग को जिस धुएँ ने घेरा हुआ है उसे थोड़ी हवा देकर हटाया जा सकता है, बस इसी निरन्तर प्रयास को प्रार्थना कहते हैं। याद रखिये की हमारे लिये प्रार्थना का लक्ष्य अपने अहंकार, लालच और मूर्खता के बोझ को अपनी आत्मा और अपने मन से उतार फेंक कर स्वयं की श्रेष्ठतायें और हमारे भीतर छिपे हुए देवत्व और ज्ञान को महसूस करने और प्रकट करने का है।
आज मेरे आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना है कि आप को जो भी अभी तक अप्राप्त है वो जल्द ही प्राप्त हो जाये और जो पहले से ही प्राप्त है, पर्याप्त है और जो आपके लिये उत्तम है वो वैसे ही बना रहे।
आपकी श्रेष्ठता, सृजनात्मकता, संपन्नता, सौभाग्य, हंसी मजाक, सद्विचारों और संचित पुण्यों और गुणों में दिनप्रतिदिन बढ़ोतरी हो इन्ही सब कामनाओं के साथ साथ आज उनसे ये भी प्रार्थना है कि आप सदैव स्वस्थ और सार्थक बने रहें। मंगल शुभकामनाएं 💐
श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।
