रविवारीय प्रार्थना – सब कुछ जानते हैं और सब कुछ कर रहे हैं के भरम और अहंकार से रहित हो कर, अपने कर्मों से, विचार, वाणी एवं व्यवहार से अनुशासित, सात्त्विक और आध्यात्मिक बने रहना तथा शुद्ध हृदय से राम नाम जपते रहना।

सदियों से, एक ही शाश्वत प्रश्न गूंजता है, एक खोज जो आत्मा को झकझोरती है: ईश्वर कि दिव्य उपस्थिति कहाँ और कैसे पाई जाए? उनकी भक्ति और पूजा का मार्ग क्या है? उन्हें कैसे पुकारा जाए, कैसे उन्हें आने हृदय के मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाए? अपने भीतर की जागृति का रहस्य क्या है, कैसे ईश्वरीय ऊर्जा, सोयी हुई दिव्य चेतना हमारी अपनी ऊर्जा और चेतना बन जाए? हमारे भीतर सोया हुआ दिव्य अंश कैसे जागृत हो, जिससे यह जीवन केवल एक घास पात ही न रह जाए, बल्कि यह घास पात भी एक खिलते हुए कमल में परिवर्तित हो जाए?

हमारा जीवन एक सुंदर कमल में रूपांतरित हो सकता है, और हमारी साधारण मिट्टी भी सोने में बदल सकती है। यह उतना मुश्किल नहीं है जितना लगता है, बस जीवन को थोड़ा समझने की जरूरत है। बिना समझे सब कुछ व्यर्थ हो जाता है, लेकिन थोड़ी सी समझ, बस थोड़ी सी समझ, सब कुछ बदल सकती है।

याद रखिये की – अमृत झरता है, निश्चित झरता है। कमल भी खिलते हैं, निश्चित खिलते हैं। पर भूमिका निर्मित करनी जरूरी है। घास-पात भी उगता है। उसी भूमि में, जहां गुलाब के फूल खिलते हैं। एक मायने में दोनों के अर्थ में कुछ भेद नहीं। दोनों एक ही भूमि से रस लेते हैं पर फिर भी एक घास-पात ही रह जाता है, एक कमल का फूल पृथ्वी का काव्य बन जाता है।

अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप घास-पात बनकर जीना चाहते हो या कमल का फूल बनकर अपने भीतर के सौंदर्य को प्रकट करता है। यह आपके चुनाव और रूपांतरण का सवाल है। दोनों के बीज होते हैं, दोनों को सूरज चाहिए, दोनों को पानी चाहिए, दोनों को भूमि चाहिए। दोनों की जरूरतें बराबर हैं। फिर भेद कहां पड़ जाता है? भेद माली में है। जो घास-पात को उखाड़ फेंकता है; गुलाबों को सम्हाल लेता है, जमा लेता है। संसार तो यही है; इसी में कोई बुद्ध हो जाता है और इसी में कोई व्यर्थ जी लेता है। भेद आपके भीतर है।

अपने माली को जगाओ, आपका माली भीतर सोया पड़ा है जिसकी वजह से आपकी बगिया में घास-पात उग रहा है। जहाँ फूल खिलने थे, जहाँ सुगंध फैलनी थी, वहाँ केवल दुर्गंध है। जहाँ प्रसन्नता, शांति, स्फूर्ति, आनंद, उमंग और उल्लास होना था, वहाँ चिंता, बेचैनी, असंतुलन, कमी, हीनता और अवसाद का डेरा है। जो ऊर्जा आकाश की ओर जानी चाहिए थी, वह अंधी खाइयों में पाताल की ओर भटक रही है। जो अमृत बनना था, वह विष बन गया है। जो सिंहासन बनना था, वह सूली बन गया है। अब प्रश्न यह है कि यह माली कैसे जागे? कौन सी पुकार उसे जगाएगी? उस पुकार का नाम ही “राम नाम” है, और उस निरंतर प्रयास का नाम ही प्रार्थना है।

प्रयास, प्रार्थना, यात्रा, उपवास, स्नान तो हर कोई कर सकता है और कर ही रहे हैं और उसका लाभ भी हो ही रहा है। लेकिन सोया हुआ माली सच मे तब जगेगा, अधिक लाभ तब होगा जब हम ‘सब कुछ जानने’ और ‘सब कुछ करने’ के भ्रम और अहंकार से मुक्त हो जाएँ। अपने कर्मों, विचारों, वाणी और व्यवहार को अधिकाधिक अनुशासित, सात्विक और आध्यात्मिक बनाकर, और शुद्ध हृदय से राम नाम का जाप करते हुए, हम अपने भीतर सोयी हुई दिव्य ऊर्जा और चेतना को जाग्रत कर सकते हैं।

आज, मैं अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि उनके आशीर्वाद और अनुग्रह से हमारे जीवन में छिपी दिव्य संभावनाएँ शीघ्र ही प्रकट हों। हमारी ऊर्जा और शक्तियाँ ऊपर की ओर उठें और हमारी क्षमता, योग्यता और पात्रता के अनुसार किए गए सभी छोटे-बड़े शुभ संकल्प, प्रयास और कर्म न केवल हमारे जीवन की सफलता और उत्कृष्टता को सुनिश्चित करें, लौकिक एवं पारलौकिक लक्ष्य हासिल करवायें बल्कि हमारे संसार के लिए भी उपयोगी हों।

आप सदा खुश रहें, स्वस्थ रहें, आनंदित रहें ऐसी मंगलकामनाओं के साथ आपको प्रेम भरा नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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