Manifestation • Mindset • Abundance • Blessings Your future self has brought you here. Time to Align, Attract & Evolve, Now🦸
जीवन के असली उद्देश्य, जैसे सत-असत का बोध, शाश्वत शान्ति व आह्लाद की प्राप्ति तथा अनन्त सामर्थ्य और परमात्मा की अनुभूति, सिर्फ कुछ सामान्य प्रयासों से प्राप्त नहीं किए जा सकते। इसके लिए आत्म-जागरूकता, आत्म-नियंत्रण, भक्तिपूर्ण प्रार्थना, कठोर पुरषार्थ और सबसे महत्वपूर्ण, निरन्तर साध-संग की आवश्यकता होती है।
साध-संग से मेरा और कोई विशेष मतलब नही है, बस यही अर्थ है कि उन लोगों की संगति में रहना जो जागृत हैं या जागृत होने की प्रक्रिया में हैं। क्योंकि जागों के पास बैठोगे तो ज्यादा देर सो न पाओगे और अगर सोयों के पास बैठे तो बहुत संभावना है कि आप भी सो जाओगे। सब चीजें संक्रामक होती हैं।
आपने कभी देखा होगा कि जब कोई व्यक्ति उबासी लेता है, तो हम भी उबासी लेने लगते हैं। या, जब कोई व्यक्ति नींद में झपकी लेता है, तो हमारी आँखें भी भारी होने लगती हैं। इसी कारण से, गाड़ी चलाते समय, हम अपने बगल में बैठे व्यक्ति को सोने से मना करते हैं।
हम सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और हमारी भावनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। चार खुश लोगों के साथ रहने से आपकी उदासी गायब हो सकती है, जबकि उदास लोगों के साथ रहने से आपकी अपनी खुशी भी गायब हो सकती है।
उसी प्रकार जब आप परमात्मा के बारे में जानने वाले और बात करने वाले लोगों के बीच बैठते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से उनकी उपस्थिति की ओर आकर्षित होते हैं। जब आप राम भजन में नाचते-गाते लोगों के साथ होते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से उनकी ऊर्जा में डूब जाते हैं। ऐसा नही हो सकता कि कबीर के पास बैठकर आपके भीतर का कबीरा नही जगे। ये स्वभाविक प्रक्रिया है।
आपको पता है न कि प्रभु श्री राम के स्पर्श से पत्थर की अहिल्या भी पुनर्जीवित हो उठी थी। यदि एक पत्थर भी जीवंत हो सकता है, तो क्या आप नहीं हो सकते? क्या आप अहिल्या से भी अधिक पत्थर हो गए हैं? नही, इतना पत्थर न कोई कभी हुआ है और न कभी हो सकता है।
हम बाहर से कितने ही पत्थर, दूषित, मिश्रित या विकृत दिखते हों, लेकिन हम सबका मूल तत्व शुद्ध ईश्वर है, जो कभी नष्ट नहीं होता। चाहे वह कितना भी दबा या छिपा हुआ क्यों न हो, साधु-संग उस आंतरिक प्रकाश को प्रज्वलित करने में मदद करता है। चाहे हम कितने ही सोए हुए हों, चाहे हम पर कितनी भी परतें चढ़ी हों, चाहे हम कितने भी खोए हुए हों, हमारे भीतर का हीरा प्रकट हो सकता है। निरंतर साधु-संग से उन परतों को तोड़कर उस मूल तत्व, शुद्ध ईश्वर को प्रकट किया जा सकता है। यही सब प्रयास, चिंतन, पठन-पाठन, ऊर्जा का केंद्रीकरण, वास्तव में हमारी प्रार्थना है और मेरे इन रविवारीय लेखों का एक लक्ष्य।
मैं आज मेरे आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूँ कि आप को निरंतर ही ऐसे लोगों के साथ साधु-संग के अवसर प्राप्त हों जिन्हें अपनी मस्ती में जीना आ गया हो तथा जिन्हें जीवन जितना आप जानते हों उससे ज्यादा दिखाई देने लगा हो। आपकी संगति उन लोगों से हो जाये जो आपको प्रेरित करें, प्रभावित करें और आपके जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करें।
आप सदा स्वस्थ और प्रसन्नचित्त रहें, आपका मूलतत्त्व (ईश्वरीय रूप) जो आपके भीतर बीज के रूप में छुपा हुआ था उसका आखिरी रूप खिल जाये, यानी के वह जो अभी तक छिपा था वो जल्द ही प्रकट हो जाये, इन्ही मंगलकामनाओं के साथ आप को प्यार भरा नमस्कार 🙏
श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।
