रविवारीय प्रार्थना – कब झुकना है और कब उठ खड़े होना है, ये समझ बनाये रखना।

हमें बचपन से ही प्रेम, शांति और सहनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है। ‘दूसरा गाल आगे कर दो’ जैसे उपदेश पढ़ पढ़ कर हम बड़े होते हैं, जो हमें विनम्र और अहिंसक बने रहने की शिक्षा देते हैं। निस्संदेह, ये गुण जीवन में सद्भाव और प्रेम बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन क्या ये सिद्धांत हर परिस्थिति में लागू होते हैं? मेरी समझ में जब आपकी गर्दन पर किसी ने जबरदस्ती चाकू रखा दिया हो तब अच्छे बने रहने की कोशिश करना नासमझी है, मूर्खता है।

दोस्तों, मैं कोई लड़ाई-झगड़े का शौकीन नहीं हूँ। मैं अक्सर विवादों से दूर रहने की कोशिश करता हूँ और यदि संभव हो तो बात को बढ़ने से पहले ही समाप्त कर देता हूँ, यहाँ तक कि कभी-कभी अपनी गलती न होने पर भी ‘सॉरी’ बोलकर मामला रफा-दफा कर देता हूँ। मेरा मानना है कि मिल-जुलकर रहने में ही भलाई है। लेकिन, जो मुझे करीब से जानते हैं, उन्हें यह भी पता है कि अगर एक बार बात मेरी इज्जत पर या मेरे अस्तित्व पर आ गई, या किसी ने बहुत देर तक लाख समझाने के बावजूद बेअदबी नही खत्म की तो फिर उसका बचना मुश्किल है।

अदब से अगर नही समझा पाओ किसी बेअदबी को तो फिर कोई चारा बचता ही कहाँ है? तो फिर कोई और विकल्प नहीं बचता। ऐसी स्थिति में, हमें कृष्ण के मार्ग पर चलना ही होगा। जब शांति के सभी प्रयास निष्फल हो जाएँ, तो ‘महाभारत’ अपरिहार्य हो जाती है, और हमें भीषण ज्वाला बरसानी ही पड़ती है।

अगर कोई अपनी मर्ज़ी से आपके घर बैठे बैठे आपके बगैर उकसाये बेमतलब या अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि के लिये लड़ने आ ही जाए, तो फिर क्यों पीछे हटना? फिर तो सीधी बात है – या तो वो रहेगा या आप। उस वक़्त अपनी पूरी ताकत झोंक दो और उसे ऐसा सबक सिखाओ कि फिर सात पुश्तों तक याद रखे।

जीवन हमें सिखाता है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जहाँ शांति और अहिंसा जैसे मूल्य इस जीवन और समस्त सृष्टि के लिये महत्वपूर्ण हैं, वहीं आत्मरक्षा और अपने सम्मान एवं अस्तित्व की रक्षा की स्वाभाविक प्रवृत्ति भी उतनी ही आवश्यक है। जब कोई आप पर ज़बरदस्ती लड़ाई थोप दे, तो पीछे हटना कायरता है। उस क्षण, ‘आर या पार’ का संकल्प लेना ही उचित है। अपनी पूरी शक्ति के साथ प्रतिकार करना और अन्याय का मुकाबला करना ही धर्म है।

कोई भी संघर्ष, चाहे वह वाद-विवाद हो, छोटी मोटी लड़ाई या युद्ध, एक भयानक अनुभव होता है। लेकिन कभी-कभी यह अपरिहार्य हो जाता है, खासकर जब बात आपके सम्मान, आपके अस्तित्व, आपके धर्म और न्याय की रक्षा से जुड़ी हो। यह सदैव अंतिम विकल्प होना चाहिए, लेकिन एक आवश्यक विकल्प।

जब विनम्रता से किसी दुष्ट को नहीं समझाया जा सकता, तो कोई और चारा नहीं बचता। तब हमें उस मार्ग पर चलना पड़ता है जो हमारी, हमारे अस्तित्व, सम्मान एवं धर्म, न्याय और सत्य की रक्षा करे। जब शांति के सभी प्रयास विफल हो जाएँ, तो एक तरह का ‘महाभारत’ अपरिहार्य हो जाता है, जहाँ हमें अन्याय के विरुद्ध अपनी पूरी शक्ति लगानी पड़ती है।

लेकिन यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि शक्ति का प्रयोग केवल तभी उचित है जब यह अपरिहार्य हो, जब बात आपके आत्मसम्मान और अस्तित्व पर आ जाए। अन्यथा, प्रेम, शांति ही हमारा मार्ग होना चाहिए।

इसलिए, जीवन की एक महत्वपूर्ण कला यह जानना है कि कब विनम्र रहना है और कब अपनी रक्षा के लिए या किसी हिंसक पशु या खतरे का सामना करने के लिए दृढ़ता से खड़े होना है। इस संतुलन को बनाए रखना ही एक प्रकार की प्रार्थना है, एक ऐसी समझ जो हमें सही समय पर सही कदम उठाने की प्रेरणा देती है।

यह मत भूलिए कि समस्त सृस्टि हमें निरन्तर देख रही है। इसीलिये हमारा प्रत्येक कर्म, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक प्रतिक्रिया सृष्टि के विराट नियामक के अनुरूप ही होनी चाहिये। जिससे कि अगर ये सब कंही अंकित और टंकित हो रही हो तो आपकी न सिर्फ इहलौकिक उन्नति बल्कि पारलौकिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त कर सके और आपको लोकपूज्य बनाये।

आज, मैं अपने आराध्य प्रभु से हृदयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि उनकी कृपा हम पर सदैव बनी रहे। वे हमें न केवल आंतरिक दृढ़ता और आत्मरक्षा की अटूट इच्छाशक्ति प्रदान करें, विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने और अपनी पहचान अक्षुण्ण रखने की जीवटता भी बनाए रखें, बल्कि वह सरलता, सहजता एवं बुद्धि भी हमारे भीतर बनाये रखें जिससे घर आंगन और संसार में प्रसन्नता की सुगन्धित हवा चारों ओर बहती रहे।

हम सब सुखी रहें, हम सब रोगमुक्त रहें, हम प्रतिदिन मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी कभी दुःख का भागी न बनना पड़े। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ, स्नेहपूर्ण नमस्कार।

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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