रविवारीय प्रार्थना – अपने पाचन और उत्सर्जन का संतुलन बनाए रखना, तथा अपने मन और आत्मा को प्रसन्न रखना।

आज रविवार है, और मेरे लिए यह आध्यात्मिक माथा पच्ची का दिन है। कुछ पुरानी बातों को नए दृष्टिकोण से समझने और समझाने का दिन है। आप कुछ भी सोचें, लेकिन आज रविवार की सुबह मेरे द्वारा आपको भेजे गए ये संदेश महज़ संयोग नहीं हैं। ये वही बातें हैं जिन्हें आज शायद किसी को पढ़ने की वाकई ज़रूरत थी, शायद किसी दैवीय प्रेरणा से ही ये आप तक भी पहुँचे हैं।

उम्मीद है आज का ये संदेश भी आपकी मदद करेगा, आपकी चेतना को जगायेगा और एक नई सोच के साथ सही दिशा में आगे बढ़ने के लिये प्रेरणा देगा।

हम सब जानते हैं कि हमारा जीवन किसी लिमिटेड-एडिशन सेल जैसा है। छोटा सा और ऊर्जा? वो तो इतनी सीमित है कि पूछो मत 🤭 और इस थोड़ी सी ऊर्जा से और सीमित से समय में हमें ब्रह्मांड की सारी पहेलियाँ सुलझानी हैं, शाश्वत को खोजना है 🤪… पता है पता है… हमसे नही हो पायेगा कम से कम इस बार तो नही। कुछ खास पुण्यात्माएं ही इस लक्ष्य को हासिल कर पाएंगी, परम् की इस चुनोती को पूरा कर पाएंगी।

चलो, इन बड़ी-बड़ी बातों को छोड़ देते हैं। कम से कम अपनी खुद की मशीनरी को तो दुरुस्त रख ही सकते हैं न? वो जो अपने अंदर ‘पाचन अग्नि’ जलती है, जो ऊतक और उत्सर्जन के काम होते हैं, शरीर के दोषों – वात, पित्त, कफ – को तो संतुलित रख ही सकते हैं? चलो ये भी मान लिया कि ये सब काम भी बहुत मुश्किल हैं और ये भी कुछ चंद लोग ही कर पाएंगे 🙊

तो फिर अपनी आत्मा, इंद्रियों और मन को प्रसन्न तो रख ही सकते हैं। खुलकर हँसने में, गुनगुनाने में, नाचने-गाने में या लोगों से मिलने-जुलने में भला कौन से वेद-पुराण या पतंजलि द्वारा लिखे गए योगसूत्र अथवा आयुर्वेद की पढ़ाई करनी पड़ती है? पर कमाल की बात तो यह है कि यह ‘बेहद आसान’ सा लगने वाला, अपने ही नियंत्रण वाला मामला भी हमसे हल नहीं हो पाता है (ब्रह्मांड की पहेली को हल करने की बात तो छोड़ ही दो)। यह आसान सा काम भी इतना मुश्किल क्यों है?

तो भाई, ये सब हम से होता क्यों नहीं? क्यों हम बड़ी-बड़ी बातें छोड़ो, छोटे-मोटे लक्ष्य भी पूरे नहीं कर पाते? मेरे अनुसार – हममें से ज़्यादातर लोग या तो शिकायतों की लिस्ट बनाने में लगे हैं, रोने पीटने और गुस्सा करने में लगे हैं, या फिर दूसरों पर इल्जाम थोपने में पीएचडी कर रहे हैं। कुछ तो बस उम्मीद का लॉटरी टिकट खरीदकर बैठे हैं कि कभी तो जैकपॉट लगेगा, और बाकी बचे हुए बस इंतज़ार कर रहे हैं, जैसे सब कुछ आसमान से टपक कर उनकी झोली में आ गिरेगा खुद-ब-खुद 😪

पर देखो, सच कड़वा है— लेकिन हकीकत यही है कि कोई जैकपॉट नहीं लगने वाला। अगर आपको कुछ भी चाहिए या अपनी ज़िंदगी में कुछ बदलना है, तो कड़ी मेहनत करनी होगी, अपनी कमर कसनी पड़ेगी। ज़िम्मेदारी खुद के कंधों पर उठानी होगी, अनुशासन में रहना होगा, दृढ़ता दिखानी होगी और सबसे अहम बात, अपनी सोच को बदलना होगा। सुनने में ये सब शायद भारी-भरकम लगता है, है ना? पर एक बार करके तो देखो, फिर आप देखोगे कि सिर्फ आसान दिखने वाले ही नहीं, बल्कि मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य भी पूरे हो जाएँगे।

इसीलिए शायद अपनी शिकायतों को खत्म करना, किसी भी चीज़ का इंतज़ार करना बिल्कुल बंद कर देना—अपने लक्ष्यों की तरफ रोज़ एक कदम बढ़ाना—हर हाल में मुस्कुराना, खुश रहना और बेकार की बातों की चिंता किए बिना, इस प्यारे से जीवन के हर पल को जी भर के जीना। और हाँ, सबसे महत्वपूर्ण, परमात्मा का हर दिन बिना नागा शुक्राना करना—बस यही हमारी सच्ची प्रार्थना है।

आज मेरे आराध्य प्रभु जी से मेरी यही प्रार्थना है कि उनकी असीम कृपा से आपके जीवन के सभी लक्ष्य शीघ्रता से पूरे हों। आपके पाचन और उत्सर्जन का संतुलन सदा ऐसा बना रहे कि आपका शरीर सदैव स्फूर्तिवान और हल्का महसूस करे। आप सदैव स्वस्थ, ऊर्जावान और भीतर से प्रसन्न रहें। आपका आने वाला प्रत्येक नया दिन खुशियों से भरा, शुभ तथा मंगलमय हो, जो आपको नई सफलताओं और अनुभवों की ओर ले जाए। इन्हीं हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, आपको एक बार फिर मेरा प्यार भरा नमस्कार! 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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