रविवारीय प्रार्थना – निरंतर चलने वाली यात्रा और अगले पड़ाव के बारे में सोचना।

आपके पास कितनी सुख सुविधा है, ये उतना महत्वपूर्ण सवाल नही है, जितना ये की आपको पीड़ा, दुख या तनाव कितना है, आपने कितने क्लेश पाल रखे हैं 🤭?

महत्वपूर्ण सवाल ये भी नही है कि मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा की नही, बल्कि ये है कि इतने जन्मों के बाद ये जो स्वर्ग रूपी धरती, संसार और मानव शरीर मिला है, उसे हम क्या बनाने पर तुले हैं 🤭?  उम्मीद है कि आप तो इस स्वर्ग को नरक में बदलने में नहीं लगे होंगे 🤔??

हमारी आत्मा ने एक अद्भुत, एक अकल्पनीय लंबी यात्रा की है। कितने ही पूर्व जन्मों के संचित पुण्यलाभ की वजह से अब जाकर यह मनुष्य शरीर, यह स्वर्ग हमें प्राप्त हुआ है। बाकी जीव-जंतुओं को देखकर तो यही लगता है कि शायद उनके पिछले जीवन की यात्रा में वह मोड़ आया ही नहीं,  जहाँ आत्म-बोध की संभावना पनपती, ये मानव शरीर मिल पाता।

अब जब यह दुर्लभ अवसर, यह स्वर्ग-सा जीवन हमें मिल ही गया है, तो अपने सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुए और जीवन का भरपूर आनंद लेते हुए इस निरंतर चलने वाली  यात्रा और अगले पड़ाव के बारे में सोचना बेहद ज़रूरी हो जाता है। यही मेरे आज के इस रविवारीय लेख का मूल उद्देश्य है।

क्या हम इससे बेहतर होंगे या कमतर 🙊? आपको पता है न, अगली बारी बकुण्ठ की भी हो सकती है। तो क्या हम इस जीवन में अपने संचित पुण्यों को बढ़ाएँगे, उन्हें कम कर देंगे या शून्य कर देंगे? दुनिया भर की माथा पच्ची करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ की अगली बार आपकी क्या मिलेगा, यह किसी और के हाथ में नहीं, यह केवल और केवल आपकी अपनी चेतना पर निर्भर करता है – आप क्या सोचते हो, तुम क्या करते हो, और सबसे बढ़कर, आप कितनी जागरूकता से जीते हो।

इसीलिए मेरा मानना है कि जीवन के हर आनंद को जीते हुए भी, इस गहरी समझ को बनाए रखना ही हमारी सच्ची प्रार्थना है – चेतना जागृति है। यह सोच केवल आने वाले जीवन की तैयारी नहीं, बल्कि यही वह आध्यात्मिक और धार्मिक जीवनशैली है जिसका हमारे ग्रंथों में वर्णन है। यही है हमारी सच्ची प्रार्थना है।

आज मेरे आराध्य प्रभु से यही प्रार्थना है कि वे अपनी असीम कृपा से हमारी दिशा और दशा दोनों को ऊर्ध्व गति प्रदान करें। जिससे हमारे भीतर की बची-खुची पशुवत वृत्तियाँ शांत हों, सारे विकार, रोग, दुख, पीड़ा और मन का कोलाहल मिट जाए। हमें सभी प्रकार के क्लेशों से मुक्ति मिले, और अपने मूल, दिव्य, अविनाशी आत्म-स्वरूप के साथ-साथ जीवन के मुख्य उद्देश्य का भी बोध हो जाए।

आपके शरीर का ओज बढ़े, जीवन आनंद से लबालब भरा रहै और आपके भीतर के सभी चेतना व ऊर्जा केंद्र जल्द ही जागृत होकर आपके अंदर के आत्मतत्व को प्रकाशित करना शुरू कर दें, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ, एक बार पुनः मेरा हृदय से प्रणाम।

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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