रविवारीय प्रार्थना – स्वयं के व्यवहार, विचारों, अनुभवों का लगातार अवलोकन करना और साक्षी भाव को मजबूत करना।

आज फिर रविवारीय माथापच्ची और फिर किसी गहरी बात को समझने और समझाने का दिन है। हम सबने सुना है कि परमात्मा हमारे भीतर ही है किसी तत्व की भांति। पर वो ईश्वरतत्व है या नही हम नही जानते और नही जानते कि उसे पहचानें कैसे? क्या सच में वो हमारे अंदर है भी या नहीं 🤭?

इसका सही और सटीक जवाब है – ईश्वर या परम चेतना हर जीव के अंदर एक साक्षी भाव के रूप में मौजूद है। हमें बस अपने भीतर उनकी इस उपस्थिति को पहचानना और उसे प्रकट करना सीखना है।

आइए, आज के विचार को एक उदाहरण से समझते हैं।

आप कहीं भी हों, कोई भी हों, क्या आपने गौर किया है? एक पल आप गुस्से से लाल हो जाते हैं, जैसे कोई ज्वालामुखी फटने वाला हो, और अगले ही पल सब शांत। कभी खुशी से ऐसे झूमते हैं जैसे लॉटरी लग गई हो, और फिर बेवजह उदास हो जाते हैं, मानो दुनिया ही खत्म हो गई हो। कभी इतना लालच आता है कि सब कुछ हड़प लें, और अगले ही पल मन वैरागी हो जाता है।ये सब तो बस हमारे मन के खेल हैं, और कुछ नहीं। ये भावनाएँ आती-जाती रहती हैं। हर विचार, हर एहसास हर पल बदलता रहता है, लेकिन एक चीज़ है जो कभी नहीं बदलती।

वह है आपका साक्षी भाव। वह जो हर बदलाव को देखता है। वह जो इस पूरे नाटक का मौन गवाह है। वह जो इन सारी भावनाओं के आने-जाने का लेखा-जोखा रखता है। जब आप कहते हैं “मैं गुस्सा हूँ,” तो आप असल में यह जानते हैं कि गुस्सा आया है। जब आप कहते हैं “मैं खुश हूँ,” तो आप जानते हैं कि खुशी आई है। तो फिर ये ‘वो’ कौन हैं जो इस सब को देख रहा हैं और शायद हमें बता भी रहा है? यही वह ईश्वरीय चेतना है जिसकी हम सदियों से बात कर रहे हैं।

केवल यही साक्षी भाव ही पूर्णतया शाश्वत है; बाकी सब एक बहाव है जो बदलता रहता है। यह साक्षी भाव ही आपके भीतर का सच्चा मालिक है। इसे न तो कोई गुस्सा हिला सकता है, न कोई दुख तोड़ सकता है और न ही कोई खुशी इसे पागल कर सकती है। यह शांत, स्थिर और अचल है। यही आपके भीतर का सच्चा परमात्मा है।

उम्मीद है ये आसान सी बात आपको आज समझ आ गयी होगी। समझ आ गया होगा कि क्या साक्षी भाव है और क्या ईश्वरतत्व है।

इसीलिये सच्ची प्रार्थना है – इस साक्षी भाव को पहचानना, इस भाव के प्रति जागरूकता और उसे मज़बूत करने का प्रयास। यह स्वीकार करना कि आप ये जो हर पल बदल रहा मन है, वास्तव में वो नही हैं, बल्कि एक दिव्य आत्मा हैं, प्रार्थना है। स्वयं के व्यवहार, विचारों, अनुभवों का लगातार अवलोकन करने और स्वयं के सच्चे सार की परम अनुभूति करना प्रार्थना है।

आज मैं अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि आप जल्द ही उस आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त कर लें जो सामान्य मानवीय चेतना और साधारण मनोभावों से परे है। आशा है कि यह क्षण और ये छोटा सा मेरा संदेश आपके लिए एक सत्संग बन जाए, और आपके भीतर छिपा हुआ शाश्वत साक्षी भाव, अमृत तत्व, और ईश्वरीय तत्व—एक कमल की भांति पूरी तरह से खिल उठे।

आप सदा स्वस्थ और प्रसन्नचित्त रहें, और आपका आने वाला प्रत्येक नया दिन शुभ और मंगलमय हो। इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ, आप सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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