रविवारीय प्रार्थना – कॉमन सेंस, ज्ञान और अपनी समझ का ज्यादा उपयोग करना; आप जो भी कहें या करें, उसमें सम्मान और प्रेम मिला देना तथा अपने हर छोटे बड़े प्रयास को अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति बना देना।

आज रविवार की यह सुबह मैंने एक ऐसे प्रश्न को उठाया है जो किसी भी दार्शनिक या आध्यात्मिक चिंतन की बुनियाद है। हमारा आज का प्रश्न है – आख़िर वह क्या है जो लोगों को—चाहे वो “पुराने वयस्क” हों या “नए वयस्क”—चाहिये अपना जीवन बेहतर करने के लिये, अपनी दुनिया को बहेतर करने के लिये और परमानंद का अनुभव करने के लिये 🤔??

और मेरे अनुसार, ये पाँच साधारण अभ्यास ही मूल कुंजी हैं: कॉमन सेंस, सामान्य ज्ञान और अपनी समझ का ज्यादा और विवेकपूर्ण उपयोग करना; आप जो भी कहें या करें, उसमें थोड़ा-सा सम्मान और प्रेम मिला देना। क्योंकि प्रेम कोई बड़ी घोषणा या दिखावा नहीं है, यह आपके शब्दों का स्वर है, यह आपकी उपस्थिति की गुणवत्ता है; और अंततः, परिणाम की चिंता किए बिना, अपने हर छोटे बड़े प्रयास में अपना सब कुछ लगा देना, उसे अपने अस्तित्व की सच्ची अभिव्यक्ति बना देना।

अब, आप ही बताइए: क्या ये साधारण से अभ्यास किसी कठिन तपस्या—महीनों तक भूखे रहने, या नंगे पाँव किसी दुर्गम तीर्थ पर जाने—जितना भारी-भरकम त्याग माँगते हैं? कतई नहीं! फिर भी, हम इन सरलतम चीज़ों को अपनी दिनचर्या में शामिल क्यों नहीं करते? अगर मैं आपसे यह कहूँ कि इन सहज अभ्यासों से आपकी ज़िंदगी आसान और बेहतर हो जाएगी, यहाँ तक कि आपको परम का अनुभव भी प्राप्त हो जायेगा, तो भी क्या आप इन्हें अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लागू करने से कतराएँगे?

लेकिन ये देखकर दुख होता है कि जानबूझकर समस्याएँ पैदा करना एक नया सामाजिक शिष्टाचार बन गया है। ऐसा लगता है जैसे हर कोई इस बात पर दाँव लगा रहा है कि कौन सबसे ज़्यादा मूर्ख, पाखंडी और धूर्त हो सकता है।  क्या हमें सचमुच संघर्ष के दलदल में चलना पसंद है? हर छोटी-सी बात को इतना पेचीदा बनाना क्यों ज़रूरी है? ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों को बिन-बात की परेशानी पालने में एक अजीब सा सुख मिलने लगा है।

मैं आपको कोई भारी भरकम उपदेश नहीं दे रहा हूँ। मैं बस इतना कह रहा हूँ: जागिए और सोचिये।

इस सुबह एक संकल्प लीजिए— अपनी Common Sense, आत्मज्ञान, सहनशीलता, सहजता और सरलता को अपना सबसे शक्तिशाली हथियार बनाइए। कोशिश करें कि कम से कम अराजक, आक्रामक, क्रोधी और जटिल बने रह सकें। कुछ भी कहने, करने या प्रतिक्रिया देने से पहले रुकना शुरू कीजिए। आप देखेंगे, आपकी शांत और गरिमामयी उपस्थिति स्वयं ही एक प्रेरणा बन जाएगी। आपकी सहजता दूसरों को यह सोचने पर मजबूर करेगी: “काश, मैं भी इतना शांत और सहज हो पाता।”

मेरा मानना है कि यही कोशिश और निरंतर प्रयास हमारी प्रार्थना भी मानी जायेगी।

में आज अपने आराध्य प्रभु जी आए प्रार्थना करता हूँ कि आपका हर शुभ संकल्प, हर प्रयत्न और हर कोशिश सफल हो। आपको न सिर्फ पहले से अधिक ईश्वरीय कृपा मिले, नए आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिले बल्कि नये बोध, दिशा और स्पष्टता प्राप्त हो, जिससे आपकी असल उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सके।

आप सदा स्वस्थ रहें और जीवन में कभी भी श्रेष्ठ करने और श्रेष्ठता को उपलब्ध होने का कोई भी अवसर आपसे कभी न छूटे—बस इसी मंगलकामना के साथ, प्रेम भरा नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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