रविवारीय प्रार्थना – ध्यान रखना की आपके हाथों, आपकी बातों से किसी भी अनावश्यक संघर्ष की शुरुआत न हो।

आज का रविवारीय चिंतन इस बात पर केंद्रित है कि हममें से कई लोग (अधिकतर 🤫) तो अब तक इतनी सी सामान्य समझ भी विकसित नहीं कर पाए हैं कि कब, क्या और कितना कहा जाना चाहिए, कब क्या करना चाहिये और क्या नही 🤭। जब यह बुनियादी बोध ही अनुपस्थित है, तो सत-असत का ज्ञान, परमानंद की प्राप्ति, और परमात्मा की अनुभूति जैसे उच्च लक्ष्य तो कोसों दूर की बातें हैं 🤣।

यदि आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि कितने ही ऐसे क्षण थे जहां आपने अगर जरा भी समझदारी एवं संवेदनशीलता दिखाई होती, तो वो न कहते, न करते, जो आप कह बैठे हैं या कर गुजरे हैं। यदि मन को थोड़ा समझा लिया होता तो हो सकता है ये वर्तमान समय और परिणाम कुछ और ही होते, भिन्न ही होते। सोचियेगा जरूर 🤫

आप भले ही ऊपर दिए गए कठोर बातों से पूरी तरह सहमत न हों, परंतु इस अटल सत्य से तो अवश्य सहमत होंगे कि हमारा यह जीवन पहले से ही अनगिनत आंतरिक और बाहरी संघर्षों से भरा पड़ा है। ऐसे में हमें अनावश्यक युद्धों को एक दूसरे पर थोपकर इसे और कठिन नहीं बनाना चाहिए ❤️

इसलिये जो अदभुत समय हमें उपहार स्वरूप इस संसार मे मिला है इसके हर पल को अपने सौभाग्य के निर्माण में लगाना, अपने घर संसार को सुंदर बनाने और इसे सँवारने में लगाना, स्वंय को उत्कर्ष बनाने और अपनी पूर्णता-श्रेष्ठता को हासिल करने में लगाना और लगाये रखना ही उनकी एक प्रकार से प्रार्थना है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से यह प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी हर अभिव्यक्ति, अपने विचारों, अपनी बातों, गतिविधियों, क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के प्रति गहन रूप से सचेत हो जाएँ, ताकि आपके हाथों किसी भी अनावश्यक संघर्ष की शुरुआत न हो। इसी के साथ, मेरी कामना है कि आप प्रेम और उल्लास से भरे रहें, सदा प्रफुल्लित और स्वस्थ रहें, और हर पल सकारात्मक ऊर्जा से भरे रहें।

आईये मिलकर मंगल की कामना करें की हमारा हर दिन हम सब के लिये शुभ हो, उत्सवपूर्ण हो।

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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