रविवारीय प्रार्थना: चेतना का निरंतर विस्तार, कर्मों में शुचिता और हृदय में अहोभाव बनाये रखना।

हर दिन, विशेषकर रविवार को, मेरा यह प्रयास रहता है कि हम अपनी सोच के दायरे को थोड़ा और बड़ा कर सकें और समय रहते जीवन में वे आवश्यक बदलाव ला सकें, जिससे श्रेष्ठ करने और श्रेष्ठ बनने का कोई भी अवसर हमारे हाथ से न छूटने पाये। ईश्वर की कृपा रही, तो यह सिलसिला आगे भी इसी प्रकार जारी रहेगा।

आज के लिए बस दो विचारणीय सूत्र: पहला तो ये की आप जो भी करते हैं, उसका केंद्र क्या है—केवल आप का स्वार्थ और अहंकार या आपके सब लोग? याद रखें, आपके कर्मों का प्रभाव केवल आप तक सीमित नहीं रहता, उससे पूरा परिवेश प्रभावित होता है। जिस दिन आप इस ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ को समझ लेंगे, धर्म-अधर्म और सही-गलत का हर संशय मिट जाएगा।

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये की जीवन में मिलने वाले हर सहयोग, हर मुस्कान और हर कड़वे-मीठे, अच्छे बुरे अनुभव के लिए कृतज्ञ रहें। जब हृदय में ‘शिकायत’ का स्थान ‘अहोभाव’ (Gratitude) ले लेता है, तब अंतर्मन में उस  वास्तविक परमानन्द और शांति का जन्म होता है, जिसे हम सब शुरुआत से ही ढूंढ रहे हैं।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से यही प्रार्थना करता हूँ कि उनकी असीम कृपा आप पर सदा बनी रहे। आप सदैव सुखी और रोगमुक्त रहें, प्रतिदिन मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और कभी किसी के दुख का कारण न बनें। हर नई सुबह आपके हंसने-गाने और खुश होने के नए कारण लाए, आपके जीवन को प्रचुरता से भर दे, आत्मा को स्थिरता दे और दैवीय एवं पूर्वजों का आशीष आपके मार्ग को प्रशस्त करे। ऐसी और भी अनेक शुभकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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