रविवारीय प्रार्थना – शिकायत से शुक्रगुज़ारी की यात्रा 🙏🙏

आज इस रविवार की शांत सुबह में, मैं आपसे एक ऐसा सत्य साझा करना चाहता हूँ जो शब्दों में साधारण है, पर अनुभव में असाधारण। यह एक ऐसा बोध है, जिससे मैं अभी कुछ दिन पहले ही गुज़रा हूँ—एक ऐसा अनुभव जिसने मेरे भीतर की हलचल को शायद एक गहरी स्थिरता में सदा सदा के लिये बदल दिया। मुझे विश्वास है कि यह आपके जीवन के लिए भी एक नई रौशनी बन सकता है।

असल में तो ये जीवन ‘शिकायत’ से ‘शुक्रगुज़ारी’ तक की यात्रा है। ये उस क्षण तक कि यात्रा है जहाँ अतीत की परछाइयां और भविष्य का डर नहीं, बल्कि वर्तमान का सत्य जीवित हो उठता है। जब कर्ता होने का अहंकार मिट जाता है और पूर्ण समर्पण का भाव जग उठता है, जब सारे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं और “प्रभु, तेरी मर्जी में मेरी मर्जी है” भाव जग उठता है।

ये भाव, ये क्षण जब सब कुछ स्वीकार होने लगे, जब यह बोध जागृत हो जाये कि सृजनहार ही स्वयं रक्षक है, लेनेवाला ही देनेवाला है; यह जीवन की उस परम अवस्था का चित्रण है जिसे कुछ लोग शायद निर्वाण कहते हैं, मोक्ष कहते हैं या कि परमानंद की स्थिति। बस यही मनोभाव बनाये रखना तथा अपने अतीत और भविष्य पर अनावश्यक बल दिये बगैर जो ‘अभी’ है, उसे और अधिक जीवंत करने और रखने में प्रयासरत रहना ही सच्ची प्रार्थना है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूँ कि आपके जीवन में यह समर्पण का पल या बोध कोई विवशता से नहीं, बल्कि एक चुनाव के रूप में आये और जल्द आये। ठीक वैसे ही, जैसे धूल से सना व्यक्ति जल की एक ही डुबकी से निर्मल हो जाता है, या मीलों का थका यात्री किसी पुराने वृक्ष की छाँव में बैठते ही अपनी थकान भूल जाता है; ईश्वर करे कि ये रविवारीय लेख और समर्पण का यह एक क्षण आपके जीवन की सारी उलझनें सुलझा दें और आपके ह्रदय और जीवन को एक गहरी शांति और सुकून से भर दें।

आप और आपका परिवार सदैव स्वस्थ, सुखी और हनुमानजी की कृपा की छत्रछाया में रहे। आपको सप्रेम सादर प्रणाम और अनेकों मंगलशुभकामनाएँ 

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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