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ईश्वर तो जितने श्री कृष्ण युग में थे, उतने ही आज भी हैं। उस महान युग मे भी सब को योगेश्वर की कृपा प्राप्त नही थी और न ही आज।
शायद उस समय मे अर्जुन ही एक ऐसे पात्र थे, जिन्हें योगेश्वर की कृपा प्राप्त हुई।
क्योंकि उन्होंने नारायणी सेना नही, श्री कृष्ण को चुना था। वे कर्म तो करते थे मगर उनमें कर्ता होने का अहंकार नही था और वे अपने आप को दूसरे लोगों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ नही समझते थे। वे चलते तो थे मगर चलने वाले नही बनते थे। उनके सभी गुण हम सब जानते ही हैं।
यानी के भगवद कृपा का असली पात्र वही है जो अपने भीतर से कर्ता को विदा कर दे। जो परम शक्ति के हाथों में साधन मात्र हो जाये–समर्पित, निमज्जित। जो जीवन के कर्तव्य, उत्तरदायित्व व उद्देश्यों की पूर्ति पूरी निष्ठा से तो करे मगर उसका फल ईश्वर के हाथों में है ऐसा माने। अपने ह्रदय मंदिर में विराजित प्रभु को जीवन की कमान सौंप कर निश्चिन्त रहे इत्यादि इत्यादि।
अर्जुन की भांति अपने कर्मों को यज्ञ की भांति करते रहना ही शायद प्रार्थना है।
आज मैं मेरे आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ की प्रभु आपकी सदा रक्षा करें। आप कुत्सित भावनाओ से दूर रहें और भगवद भाव को सदा समर्पित रहें। आपकी सफलता की दुनियाभर में चर्चा हो। आपका जीवन आशा, उत्साह, उमंग एवं उपलब्धियों से सदा भरा रहे। मंगल शुभकामनाएं।
