रविवारीय प्रार्थना – ईश्वरीय कर्म फल की व्यवस्था।

मुझे लगता है कि ईश्वर का सृष्टि रचियता होने और उसके पोषण करता होने में तो हम में से किसी को भी कोई संशय नही है। मगर उनके नियामक होने और उनकी कर्मानुसार दंड या पुरस्कार देने की व्यवस्था पर संदेह रहता है और कर्म फल के सिद्धांत तथा इसकी निश्चिन्तता पर विश्वास नही होता है।

आज का लेख आपको कर्म फल का सिद्धांत याद दिलाने और समझाने वास्ते ही है।

उनका खेल सीधा सा है जो करना है (अच्छा या बुरा) करो लेकिन उसका भुगतान करने के लिये और किये हुए को भुगतने को तैयार रहो। आप उनकी बनाई हुई सबसे श्रेष्ठ रचना हैं, इसीलिए इस संसार मे आप पूर्णतः स्वतंत्र हैं जो चाहे उसे करने के लिये। कोई बंदिश नही है। लेकिन किये हुए कार्य का अंजाम (अच्छा या बुरा) आप को देर सबेर भुगतना ही पड़ेगा। उससे कोई नही बच सकते है।

बीज बोने, उसके पेड़ बनने और फिर उसके पके हुए फलों को प्राप्त करने में समय लगता है। मगर हम सब जानते हैं कि ये पूरी प्रक्रिया सर्वमान्य है और हर हालत में हो कर ही रहती है। उसी प्रकार कर्मफल व्यवस्था भी पूर्णतः सुनिश्चित है। आपके प्रयासों, बुद्धिमत्ता, स्वतंत्र विवेकशीलता और ईश्वरीय चेतना तथा व्यवस्था पर आपके विश्वास को परखने के लिये बनाई गई व्यवस्था में आपके किसी भी अच्छे या बुरे कृत्य का प्रतिफल (न तो दंड स्वरूप और न ही पुरस्कार स्वरूप) तत्काल प्राप्त नही होता है।

उनके विधान में झूठ बोलने से तुरंत मुँह में छाले पड़ने का प्रावधान नही है और न ही चोरी करने से हाथ कट जाने का। कर्मफल कोई बिजली के तार को पकड़ने से करंट लगना और आग को छूने से जल जाने जैसा तत्काल परिणाम प्राप्त होने वाला सिद्धांत नही है। और इसी वजह से जो लोग आस्तिक नही हैं, संत स्वभाव के नही हैं या दूरदर्शी नही हैं वो इस कर्म फल के सिद्धांत को समझे बगैर मदोन्मत्त होकर पशु की भांति उद्दंडता पर उतारू रहते हैं और कुकर्म करने में संलग्न रहते हैं।

इसलिए मेरा मानना ये है कि उनकी कर्म फल व्यवस्था से अप्रत्यक्ष रह भी उसे प्रत्यक्ष रूप में सतत अनुभव करना प्रार्थना है। लौकिक लाभों के लालच में निंदनीय और विघातक कार्यो से बचना ही प्रार्थना है। अवांछनीय कार्य कर के केवल दंड से बचने के लिये पाखण्ड से भरे हुए पूजा पाठ के हथकण्डे अपनाने की बजाये सदैव सत्कर्मो में संलग्न रहना ही प्रार्थना है। अपनी सर्वविदित पतोन्मुख चतुराई का इस्तेमाल करने की बजाये सरलता और सहजता से नीतिगत, नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं, अपने कर्तव्यों और प्रतिबद्धताओं का पालन करते रहना ही प्रार्थना है।

आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि आप का बहुमूल्य मनुष्य जीवन सच्चे अर्थों में सार्थक बन जाये तथा आप जल्द ही अम्रत, पारस और कल्पवृक्ष की तरह सर्वगुण और सर्वसम्पन्न बन जाएं।

आपको जल्द ही सही मायनों में ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त हो और ईश्वर से अत्यधिक लगने वाली दूरी निकटता और घनिष्ठता में परिवर्तित हो जाये.. इन्ही सब मंगलकामनाओं के साथ साथ मैं आज उन से ये भी प्रार्थना करता हूँ की आपके सत्कर्मों के फलस्वरूप आपको हर प्रकार की रिद्धि सिद्धि जल्द ही प्राप्त हो। मंगल शुभकामनाएं 🙏

रामाय नमः। श्री राम दूताय नम:। ॐ हं हनुमते नमः।।

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