रविवारीय प्रार्थना – ये समझ बनाए रखना कि आपके अपने नूर में ही उनका नूर समाया है।

आज रविवार है—चिंतन, आत्मावलोकन और स्वयं के परिष्कार का दिन। यह दिन उन साधारण सी दिखने वाली असाधारण बातों को पुनः स्मरण करने और उन्हें अपने आचरण में उतारने के लिए है, जो अक्सर पीछे छूट जाती हैं।

हम अक्सर उन चीज़ों से लड़ने में जीवन बिता देते हैं, जिनका असल में कोई वजूद ही नहीं है। और उन को भुला देते हैं जो वजूद में हैं जो हमारे अपने वश में हैं था सरलता और सहजता से उपलब्ध हैं। हम सब, जो थोड़े से भी सजग या प्रबुद्ध लोग हैं, चाहते हैं कि इस संसार से अंधकार मिट जाए, असत्य की पराजय हो जाए, हर जगह केवल सत्य का प्रकाश हो जाए तथा हमें ईश्वर प्राप्त हो जाएं, लेकिन ये सब होगा कैसे?

आज का ये रविवारीय लेख यही बताने के लिय है। जैसे अंधकार अपने आप में कोई ‘चीज़’ नहीं है जिसे आप पकड़ सकें या कमरे से बाहर धकेल सकें। अंधकार केवल ‘प्रकाश की अनुपस्थिति’ है। ठीक वैसे ही—अधर्म, अशांति या ‘ईश्वर का न होना’—कोई वास्तविक स्थितियाँ नहीं हैं। ये केवल सत्य, शांति, प्रेम और हमारे अपने बोध के ‘अभाव’ का नाम हैं।

जैसे हम अंधेरे से लड़ने के बजाय रोशनी करते हैं (भले ही रोशनी करने के तरीके और साधन अलग-अलग हों) और अंधेरा स्वतः ही मिट जाता है; वैसे ही धार्मिक, आध्यात्मिक या बुद्ध होने के लिए बाहर कुछ खोजना या नया कुछ पाना नहीं है। जो आपके भीतर पहले से ही मौजूद है, उसे पहचानना है और अपने आचरण, अपने शब्दों व अपने कार्यों में उसे प्रकट (Manifest) करना है। यह आपकी चेतना का एक ‘स्व-स्फुरण’ है, एक प्रस्फुटन है। बस अपने ‘नूर’ को बाहर लाना है।

आपके अपने नूर में ही उनका नूर समाया है। इस बात को समझना और इसे अपने अमल में लाना ही हमारी सच्ची प्रार्थना है।

आज मैं अपने आराध्य प्रभु से यही प्रार्थना करता हूँ कि संसार की परिस्थितियाँ आपको कितनी ही प्रभावित करें, आप कभी यह न भूलें कि आप स्वयं प्रकाश और परमानंद का स्रोत हैं – परमात्मा का ही अंश हैं, इसलिए स्वयं को उस ‘ब्रह्म’ में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को कभी न छोड़ें।

आप स्वस्थ रहें, आपको सतत सुख-संतोष, परम शांति और जल्द ही भगवत कृपा का अनुभव हो। आपकी ऊर्जा और आपके प्रकाश से न सिर्फ आपका, बल्कि आपके पूरे संसार का अंधेरा मिट जाए – इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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