रविवारीय प्रार्थना – आपके भ्रम, असंतोष, वैमनस्य, संघर्ष ऐसे किसी अनुचित कर्म या व्यवहार के लिए आपको उकसा न पाए, जिसका कड़वा प्रतिफल बाद में आपकी आत्मा को स्वीकार न हो।

आज इस रविवारीय आध्यात्मिक लेख में मैं जीवन के एक ऐसे यक्ष-प्रश्न पर बात कर रहा हूँ जो हम सबके भीतर कभी न कभी अवश्य उठता है—कि हम सब इतने समझदार, हुनरमंद और साधन-संपन्न हैं कि आज एक क्लिक में दुनिया भर की कोई भी चीज़ हमारे सामने आ जाती है। लेकिन इस सब के बावजूद, हम न तो असल ‘ब्रह्मानुभूति’ को उपलब्ध हो पाते हैं, और न ही हमारे जीवन से उस ‘ब्रह्म-वृत्ति’ या ब्रह्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो पाती है जो अंततः हमें परमगति प्राप्त करवायेगी या उस ओर ले जायेगी 🙈। आइए, आज शांत मन से इसे समझते हैं।

हम सब को यकीनन पता है कि हमारी जिंदगी कर्म-प्रधान है, पर सच बताना… क्या हमारे दैनिक कर्मों में, विचारों में, वाणी में, व्यवहार में, संस्कार और चरित्र में वो खुशबू, वो ताजगी, वो पवित्रता और वो सुन्दरता होती है जिससे उस परमात्मा की जो सर्वत्र विद्यमान हैं उनका अनुभव हो सके 🤔🤔?आपको बुरा लगेगा लेकिन मेरा तो ये मानना है कि आप जो सदियों से करते आ रहे हो – दोहराते आ रहे हो उसने ही आपको उनसे दूर रखा हुआ है, किसी दूसरे ने नहीं 🤫

और उसके ऊपर गजब तो ये है कि आप हमेशा अपने अच्छे बुरे कर्मों के समर्थक बने रहते हो। अगर आप गौर करोगे तो पाओगे कि जब भी आप कोई गलत काम या चालाकी करते हैं, तो खुद के सबसे बड़े वकील बन जाते हो और दलीलें देने लगते हो —“अरे, परिस्थिति ऐसी थी, इसलिए ऐसा करना पड़ा।” हम अपनी हर भूल को सही ठहरा देते हैं। नतीजा? हमें कभी सही और गलत कर्म का असली बोध ही नहीं हो पाता। और कोई दूसरा बताए तो बुरा मन जाते हो 😂।

इसीलिए आज इस लेख के माध्यम से मेरी एक छोटी सी गुजारिश है—आप अपने कर्मों के बस न्यायधीश बन जाईए। स्वयं को स्वयं के उचित और अनुचित कर्मों का बोध होने दीजिए। केवल दूसरों को और अपने आस-पास की दुनिया को देखने की बजाय, अपने भीतर देखिये और जो भी झूठ, असत्य, भ्रम, असंतोष, वैमनस्य, संघर्ष या जो भी पशुता अभी भी बची पड़ी है उसे साफ करने की कोशिश करिए। और अगर वो पूरा मैल और कूड़ा करकट पूरी तरह से साफ न कर पाए तो कम से कम इतनी सजगता और होश जरूर रखिए कि वे सब आपको किसी ऐसे अनुचित कर्म या व्यवहार के लिए उकसा न पाए, जिसका कड़वा प्रतिफल बाद में आपकी आत्मा को स्वीकार न हो। बस, यही छोटी सी समझ, आत्म-संयम (आत्म-नियंत्रण) और प्रयास हमारी सच्ची प्रार्थना होगी।

आज मैं अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूँ कि आपकी समझ और चेतना शुद्ध हो जाए और उस पर छाए हुए बादल छट जाएं जिससे आपके भीतर जो कुछ भी अवांछित, अनुचित, छोड़ने योग्य भरा पड़ा है, उन सब में तेजी से कमी आए जिससे आपकी आत्मा का असली प्राणस्वरूप – ईश्वर स्वरूप प्रकट हो सके।

आप स्वस्थ रहें, आपको सतत सुख-संतोष, परम शांति और जल्द ही भगवत कृपा का अनुभव हो। आप इस जीवन की श्रेष्ठ सम्भावनाओं को जल्द ही साकार कर पायें, इन्हीं सब मंगलकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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