रविवारीय प्रार्थना – अपनी देहबुद्धि से ऊपर उठकर ‘हम आज जो हैं’ और जो ‘हमें होना चाहिए’ या जो ‘हो सकते हैं’ उसमें अंतर समझना और अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को पाने का निरंतर प्रयास ही प्रार्थना है।

आज इस रविवारीय लेख के माध्यम से मैं आपके साथ वह बात साझा कर रहा हूँ, वह एक सवाल साझा कर रहा हूं जिसने इस पूरे हफ्ते मुझे सोचने पर मजबूर किया। वो है कि हम जैसे होने चाहिए वैसे नहीं हैं। और जैसे हो सकते थे वो तो बिल्कुल ही नहीं हैं। लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है—अहम सवाल यह है कि क्या हम वाकई इस बात से बेखबर हैं, या फिर सब कुछ जानते हुए भी हमने खुद को भ्रम की एक पट्टी से ढँक रखा है 🤔?

और जब तक हम इस कड़वे सच को, अपने वर्तमान और अपने वास्तविक स्वरूप के इस बड़े अंतर को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक उस दिव्य, अखंड और अद्वैत चेतना का अनुभव कैसे होगा? हम अपने परम लक्ष्य तक भला पहुँचेंगे कैसे 🫣?

आइए विचार करें कि कैसे इस गहरी खाई को पाटा जाए। कैसे आत्मोन्नति का वह मार्ग खुले, जो हमें अनंत चैतन्य तक ले जाये। इसके लिए हमें कुछ कठिन और साहसी कदम उठाने होंगे क्योंकि सस्ते और सतही उपायों से तो ये होने वाला नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझें: जैसे सूखी लकड़ी पर कागज़ के नकली फूल चिपका देने से वह पेड़ हरा-भरा नहीं हो जाता, वैसे ही केवल पेड़ से टूटे हुए फल-फूल भगवान को चढ़ा देने से ईश्वर खुश नहीं हो जाते हैं। वो भी चढ़ाये, कोई मनाही नहीं है लेकिन ये तो समझना ही होगा कि वास्तव में वे क्या चाहते हैं – वे तो यह देखना चाहते हैं कि आपके भीतर करुणा, प्रेम और समझ के कितने फूल खिले हैं। असली पूजा मंदिर के दीये जलाने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के बुझे हुए दीपक को प्रज्वलित करने से होगी। जब आप अपने भीतर बदलाव की वो सुगंध लेकर उनके पास जाएँगे, तभी उन्हें लगेगा कि हाँ, आज मेरा कोई अपना आया है।

असल में तो हमें अपने भीतर छिपी दुर्भावनाओं और संकीर्ण स्वार्थों को जड़ से खत्म करना होगा। हमारा क्रोध, लोभ लालच, बेकार की असीमित इच्छाएं और मन के सारे भ्रम रूपांतरित होने होंगे। जब तक हमारे चित्त का रवैया और जीवन की शैली नहीं बदलेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। “मैं कुछ कर रहा हूँ” का केवल एक झूठा भ्रम पाले रखना और वास्तव में कुछ न करना—ऐसे कार्यों से न ही तो जीवन का असली रस मिलेगा और न ही वे प्रसन्न होंगे।

वैसे तो आप बेहद समझदार हैं और सब बातों का ज्ञान भी आपको है, फिर भी एक बार याद दिला दूँ कि आपकी अंतर्निहित श्रेष्ठता का प्रकटीकरण तब ही संभव है जब आपको आत्मबोध, अंतःशुद्धि, करुणा और समत्व केवल एक महज़ विचार लगना बंद हो जाये और ये आपकी रोज़मर्रा की जीवन-पद्धति बन जाए। जब आप अपनी सीमित ‘देहबुद्धि’ से ऊपर उठकर, अपने वास्तविक और मूल स्वरूप—जो शुद्ध, बुद्ध और नित्य ब्रह्मस्वभाव है—उसमें लौटेंगे तभी कुछ संभव हो पाएगा अन्यथा कदापि नहीं।

इसीलिए, मेरे दृष्टिकोण में, प्रार्थना कोई बाहरी परिस्थितियों को बदलने की भीख नहीं है, बल्कि यह अपने चित्त वृत्तियों को निर्मल करने की साधना है। यह किसी अलौकिक जादुई शक्ति को पाने का जरिया नहीं, बल्कि सनातन सत्य को समझने और महसूस करने की कोशिश है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, और यह पूरा संसार उसी एक आत्मतत्त्व की अभिव्यक्ति है। व्यावहारिक शब्दों में कहूँ, तो अपनी ज़िंदगी की उन 75% व्यर्थ और बेकार की गतिविधियों को छोड़ देना जो आपकी ऊर्जा सोखती हैं, और केवल वही करना जो आपके व्यावहारिक संसार और आध्यात्मिक उन्नति के लिए ज़रूरी है— सच्ची प्रार्थना है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूं कि आपके जीवन से सारी मानसिक अशान्ति, तनाव, डर, व्यर्थ का अहंकार और हर प्रकार की अस्तित्वगत शून्यता खत्म हो जाए। आपके भीतर स्थिरता और परम रोशनी और शांति का उदय हो। आपकी आत्मा से परमात्मा होने की और ‘बुद्ध’ बनने की यात्रा आज से ही आरम्भ हो जाए।

आपको जल्द ही फकीराना बेफिक्री और शहंशाह सा सुकून प्राप्त हो तथा आपका शरीर, मन, मस्तिष्क और आत्मा स्वस्थ और प्रसन्न बने रहे, इन्हीं सब मंगल शुभकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार।

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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