रविवारीय प्रार्थना – अपनी मनगढ़ंत धारणाओं, सहूलियतों और इच्छाओं को छोड़ कर सनातन सत्यों और ईश्वरीय वचनों का निष्ठापूर्वक अनुसरण करना, उन्हें अपने रोजमर्रा के जीवन में प्रतिबिंबित करना ही हमारी प्रार्थना है।

शास्त्रों को कंठस्थ कर लेना, सनातन सिद्धांतों और सत्य की बातें समझ लेना केवल बौद्धिक तृप्ति दे सकता है—आध्यात्मिक उन्नति, आत्म-साक्षात्कार या ब्रह्मानुभूति नहीं। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ जानकारी का कोई अभाव नहीं है; जीवन और ब्रह्मांड के लगभग सभी गूढ़ सत्य और रहस्य हमारी उंगलियों पर सहज उपलब्ध हैं। हम यह भी भली-भांति जानते हैं कि धर्म क्या है अधर्म क्या है – सही क्या है और गलत क्या। फिर भी, यह एक गहरा विरोधाभास है कि इतना सब जानने बूझने के बाद भी हम सत्य से, स्वयं से और ईश्वर से कोसों दूर और भ्रमित क्यों हैं?

कारण बहुत साफ है—केवल यह जान लेना कि धर्म क्या है, किसी को ‘धार्मिक’ नहीं बना देता। ग्रंथों को मात्र पढ़ लेना, कहे अनुसार नाम-जप कर लेना और नियम से पूजा-पाठ में बैठ जाना बहुत सुंदर शुरुआत है; लेकिन अगर वे पढ़े गए – दोहराए हुए शब्द, वे पल दो पल के मनोभाव और वह ज्ञान अगर हमारी वाणी, हमारे व्यवहार, हमारी सोच और हमारे रोज़मर्रा के कामकाज में नहीं ढलते, तो इस सब का कोई आध्यात्मिक या धार्मिक अर्थ नहीं रह जाता।

आज का रविवारीय लेख इसी कड़वे सच और स्पष्टता पर आधारित है। ज़रा ठहरे मन से सोचिए—यदि हमारी सोच और लक्ष्य तो उच्च स्तरीय हों, लेकिन आचरण और कर्म निम्न स्तरीय… तो फिर बात कैसे बनेगी? ऐसी विरोधाभासी स्थिति में हमारे पास केवल दो ही मार्ग बचते हैं। या तो हम यह बड़ी-बड़ी बातें करना ही बंद कर दें—जैसे मोक्ष की बातें, ‘अंधेरे से प्रकाश की ओर जाना’, ‘अणु से विभु’, ‘नर से नारायण’ और ‘आत्मा से परमात्मा’ बनने की बातें  – और जिस ढोंग व पाखंडपूर्ण जीवन में जी रहे हैं, उसी में मस्त रहें। या फिर, जो थोड़ा सा भी सत्य हम जानते हैं, उसे पूरे साहस, ईमानदारी और सजगता से अपने आचरण में ढालना शुरू करें।

अभी देर कंहा हुई है, आइये आज से ही सिर्फ जानने के स्तर से ऊपर उठकर ‘होने’ के स्तर पर आना शुरू कर दें। याद रखिये कि धर्मग्रंथों में कहे गये प्रभु के वचनों और निर्देशों का निष्ठापूर्वक अनुसरण करना, उन्हें अपने शब्दों, सोच और कर्मों में प्रतिबिंबित करना ही हमारी प्रार्थना है।

आज मैं अपने आराध्य प्रभु से यही प्रार्थना करता हूँ कि वे हम सब पर कृपा करें, ताकि हम सचेत और सावधान रहकर ईश्वरीय वचनों और सनातन सिद्धांतों का वास्तव में पालन कर सकें—न कि केवल अपनी मनगढ़ंत धारणाओं, सहूलियतों और इच्छाओं के हिसाब से। ईश्वर करे कि समय रहते, इसी लोक और इसी जीवन में, हम परम शांति, पूर्णता, आनंद और अपने ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सकें तथा उसे दुनिया के सामने ला भी सकें।

आपका शारीरिक स्वास्थ्य और रोग-प्रतिरोधक क्षमता सुदृढ़ बनी रहे, मन उत्तरोत्तर शुद्ध और सुंदर होता चला जाए तथा आपका जीवन प्रतिपल शुभता, सौंदर्य और दिव्यता से सदा महकता रहे। आप शीघ्र ही अपने जीवन की अनंत संभावनाओं के शिखर को स्पर्श कर सकें—इन्हीं हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ, आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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