रविवारीय प्रार्थना – जीवन और सांसारिक ज़रूरतों को निभाते हुए अपनी हर अभिव्यक्ति को देह, मन और अहंकार से मुक्त कर, भीतर छिपे ईश्वरीय चैतन्य के अनुरूप बनाना ही प्रार्थना है – आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।

इन रविवारीय लेखों में जो मैं लिखता हूँ, वह तब लिखता हूँ जब पढ़ते-पढ़ते मेरा मन विचारों से इतना भर जाता है कि जो बात समझ आई है, जो भीतर उतरी है, उसे शब्दों में ढाले बिना शांति नहीं मिलती।

आज मन के उसी कोने से जो बात मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ—वह कोई बहुत अलौकिक या विशेष नहीं है। आज केवल यह अहसास कराना चाहता हूँ कि हम ज्यादातर जो भी कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं, वह केवल देह, मन और अहंकार से उपजी संकीर्ण अपेक्षाओं, असंतोष और द्वेष की वजह से कर रहे हैं; न कि अपने भीतर छिपे हुए परमात्मा के उस सूक्ष्म, सर्वव्यापक, सृष्टिकर्ता और परम मंगलमय स्वरूप की चेतना में रहकर 🤫। और यही हमारे भय, तनाव, चिन्ता, निराशा और अधिकतर समस्याओं का कारण है।

आपका तो पता नहीं, लेकिन मुझे तो यही लगता है कि अपने जीवन और संसार की ज़रूरतों को पूरा करते हुए आपकी हर अभिव्यक्ति केवल मन, बुद्धि, अहंकार अथवा शरीर से संचालित न होकर, भीतर छिपे उसी ‘नित्य, शुद्ध और मुक्त’ चैतन्य की – प्रेम की सहज झलक बन जाए, तो बस काम बन गया।

मेरा स्पष्ट मानना है कि सर्वोच्च धार्मिक या आध्यात्मिक पुरुषार्थ और सच्ची प्रार्थना यही है कि हम देह, मन और अहंकार के पार अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचानें; और उसे अपने व्यक्तित्व, व्यवहार तथा जीवन-पद्धति में स्पष्ट रूप से दिखाई देने दें। हमारी वाणी, हमारा आचरण और हमारे कर्म—सब कुछ उसी परम स्वरूप का प्रकटीकरण बन जाएँ।

आज अपने आराध्य प्रभु के चरणों में यही सविनय प्रार्थना है कि उनकी असीम कृपा से हमारा जीवन किसी देहाभिमान या बाह्य आडंबर से नहीं, बल्कि आंतरिक ब्रह्मनिष्ठा, प्रेम और ब्रह्म-वृत्ति से परिभाषित हो, और हम उनके दिव्य प्रकाश की एक सजीव अभिव्यक्ति बने रहें।

आप सदैव स्वस्थ रहें, प्रसन्नचित्त रहें और इस बोध को अपने जीवन का प्राण बनाकर इसे पोषित करें, इसे जिएँ और इसी बोध में स्थित होकर इसके प्रचार प्रसार में लगे रहें। आपका जीवन सफल, धन्य और वंदनीय बनता चला जाए, इन्हीं सब हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ, आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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