रविवारीय प्रार्थना – आप जागरूक हों और आपका अपनी जागरूकता को बढ़ाने का प्रयास प्रार्थना है।

आज रविवार की इस शांत सुबह में अपनी जागरूकता का स्तर परखें—जानिए कि आप कितने सजग इंसान हैं। क्योंकि प्रखर बुद्धि, दुनिया बदलने का सामर्थ्य और असीम ऊर्जा होने के बावजूद, यदि आप भीतर से जागे हुए नहीं हैं—जागरूक नहीं है—तो यह सब किसी ख़ास काम आने वाला नहीं। कम से कम आध्यात्मिक स्तर पर तो नहीं, न तो पारलौकिक अनुकूलताओं का सृजन होने वाला है और न ही आपकी उच्चतम संभावनाएं साकार होने वाली हैं।

आज इस रविवारीय लेख में मैं जिस जागरूकता की बात कर रहा हूं उसे समझना बहुत आसान है।

अगर किसी कमरे में घना अंधेरा फैला हो, तो आप उसे इग्नोर कर के, वहम मान कर या लड़कर या झाड़ू लगाकर बाहर नहीं निकाल सकते। उस के लिये आपको कमरे में रोशनी करनी होगी। एक दीया जलाना होगा — और जैसे ही थोड़ी सी भी रोशनी होने लगेगी अंधेरा गायब होने लगेगा। क्यों? क्योंकि अंधेरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, वह केवल रोशनी का अभाव होता है। वही बात जागरूकता की भी है। जागरूक होते ही आपके भीतर से ईर्ष्या, अहंकार, नफ़रत, कड़वाहट और उदासी का अंधेरा खुद-ब-खुद पिघल जाता है और आपके भीतर प्रेम, परवाह, शांति, विनम्रता और आंतरिक सुंदरता प्रकट होने लगती है।

कमरे में जब तक अंधेरा रहता है, तब तक ही धूल, उलझन और डर राज करते हैं और जैसे ही रोशनी होती है वो सब आपको स्वाभाविक रूप से बुरी लगने लगती है और आप उसे साफ करने लगते हैं। क्योंकि रोशनी का एक नियम है केवल सुंदर और सही चीज ही रोशनी में टिक पाएगी, गन्दी और गलत नहीं। जागरूकता भी आत्मा की वही रोशनी है। सजग होते ही मन को झुलसाने वाले विकार और भीतर की आसुरी वृत्तियाँ दम तोड़ने लगती हैं। गंदा आचरण, घटियापन, नीचता, गलतियाँ, नकारात्मकता और भटकाव स्वतः छूटने लगते हैं, और आपके आचरण में पुण्य, प्रेम, सकारात्मकता और सात्विकता का प्रवाह सहज होने लगता है।

इसीलिए मेरा मानना है कि आपको स्वयं को जागरूक करना है। अपनी जागरूकता को बढ़ाना है और उसे दिन रात इस्तेमाल करना है। बस यही आपके लिए एक प्रार्थना होगी।

और हो सकता है कि आपकी जागरूकता की रोशनी में न सिर्फ आपको, बल्कि अन्य लोगों को भी वह सब दिखाई देने लगे जो अब तक छुपा हुआ था – अप्रत्यक्ष था। हो सकता है कि आप अपने अस्तित्व के उच्चतम स्तर पर पहुँच जाएं। हो सकता है कि आपको ब्रह्म के प्रकाश को धारण करने योग्य अपने आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो जाए; और आपको उस ‘जीव-ब्रह्म-अभेद’ की अनुभूति हो जाए जो हर इंसान का आध्यात्मिक ध्येय होता है—जो वास्तव में मोक्ष की स्थिति है, सच्चे पुरुषार्थ का फल है और उपनिषदों का मूल सार है।

आज अपने आराध्य प्रभु के चरणों में यही प्रार्थना है कि आपकी सजग चेतना का नित्य विस्तार हो। वह सुंदरता, दिव्यता, वह उदात्त गरिमा और वह ईश्वरीय अंश, जो अंतःकरण की सबसे सूक्ष्म परतों में आपके भीतर पहले से ही विराजमान था, वह पूर्णतः प्रकट हो उठे तथा आपको और सभी को स्पष्ट दिखाई देने लगे।

आप सदा स्वस्थ, शांत और प्रसन्नचित्त रहें। आने वाला प्रत्येक नया दिन आपको सुख, शांति, स्थिरता, संतोष, आत्मोत्कर्ष एवं आपके अपने उच्चतम स्तर की ओर ले जाए। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार।

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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