प्रार्थना का मतलब है परदे खोलना। रविवारीय प्रार्थना ।।

आपका और मेरा जीवन, हमारी सोच, हमारी बनाई हुई चीजों और हम जो दुनिया दिन प्रतिदिन गढ़ रहे हैं उस की सीमाएं हैं। लेकिन परमात्मा, उसका बनाया हुआ कुछ भी सीमित नही है। उसके हाथ की जिस चीज पर भी छाप है वही अनंत है, वही असीम है। न आदि है उसका न अंत है उसका।

हरि अनंत हरि कथा अनंता। मैंने आज इस रविवारीय लेख की परिकल्पना और संकलन इसी विचार के साथ किया है।

जो अपने सभी आयामों में अनंत है, उन्हें पाना, उन्हें ढूंढ लेना और उन्हें वँहा (स्वर्ग) से उतार लाना हमारे जैसे साधारण मनुष्यों के बस की बात कैसे हो सकती है।

आप कोई भी हैं, कृप्या बतायें की क्या आप चांद और सूरज उगा या छुपा सकते हैं, हवा को चला सकते हैं, बारिश को करवा सकते हैं? इसी तरह ईश्वर के भी पाने का भी आपके पास कोई उपाय नहीं है। कम से कम मेरे जैसे साधारण मनुष्य के पास तो नही है। वे तो अथाह हैं। मुझे तो सिर्फ ये लगता है कि उनमें तो स्वयं को मिटा कर डूब ही सकते हैं उनमें खो सकते हैं और तब ही उस सचिदानंद को या उस पूर्णता को पा सकते हैं। यही हम सबके वश में है। मैं तो खो जाने और उन्हें पाने में प्रयास रत हूँ। आप का पता नही 🤭।

जैसा कि मैंने कहा कि आपकी इच्छा से सूरज नहीं निकल सकता। कि आप जब चाहो तब निकल आये। लेकिन अगर आप इसे नही देखना चाहो तो, जन्मों – जन्मों तक न देखो, आंखे बंद रख सकते हो। द्वार -दरवाजे बंद रख सकते हो। खिड़कियों पर मोटे मोटे परदे लटका सकते हो फिर आपके कमरे में सूरज कैसे आयेगा। अगर आप चाहो की अंधकार ही रहे, तो भरे दिन में भी अंधकार ही रहेगा, उजाला नही होगा। यही आप ईश्वर और ईश्वरीयता के साथ भी कर रहे हो।

ईश्वर कहीं और थोड़े ही हैं – यहीं है, अभी है, कण-कण में हैं, कंही गये थोड़े ही हैं। लेकिन आप बज्रमूर्ख हैं, निरर्थक हैं, आत्‍ममुग्‍ध हैं। आपने स्वंय ही परदे कर रखे हैं। अपनी जड़ता की वजह से अपने कमरे को बंद कर के रखा है। कोई खिड़की खोल ही नही रखी है की उनकी कोई थोड़ी सी भी झलक, ज्योति, अनुभूति या अहसास कंही से अंदर आ जाये। मेरे अनुसार हमारी कोई भी कथा, प्रथा, प्रार्थना या धार्मिक क्रिया परमात्मा को लाने के लिये है भी नही, ये सिर्फ आपकी जड़ता को तोड़ने के लिये हैं, आपके अभिमान को आपके मैं को खत्म करने के लिये हैं। आपको सरल, सहज और विनम्र बनाने के लिये हैं, स्वंय को बेहतर बनाने के लिये हैं।

प्रार्थना का मतलब है परदे खोलना। मगर ये याद रहे कि परदे खोलने से सूरज के उग आने का कोई संबंध नहीं है। सुबह तो जब होगी तब होगी। सुबह के तो अपने राज हैं, अपने रास्ते हैं, अपना मार्ग है 🤭। प्रार्थना का मतलब है अपने द्वारा निर्मित खिडकिया, द्वार – दरवाजे खोलना और खुले हुऐ रखना जिससे जब सुबह हो जब सूरज उगे तब आपके कमरे (जीवन) में भी रोशनी भर जाये।

ईश्वर को जब आना है तब आएगा; आप और मैं उनको खींचकर नहीं ला सकते हैं। लेकिन हम इतना तो जरूर कर सकते हैं कि जब वे आयें तो हम मौजूद रहें। हम द्वार पर वंदन वार बांध सकते हैं, दीये जला सकते हैं, अपने द्वार पर बांसुरी बजा (बजवा) सकते हैं, उनके स्वागत में फूल बिछा सकते हैं, पलके बिछा सकते हैं। वे जब आएंगे तब आएंगे। हमारा कोई कार्य या कोई कारण ऎसा है ही नही की उन्हें प्रगट होना पड़े। ऐसी कोई अनिवार्यता है ही नहीं। वे जब आएंगे तब आएंगे। प्रसाद जब बरसेगा तब बरसेगा। लेकिन इतना तो हम कर ही सकते हैं कि जब प्रसाद बरसे तो हम वंचित न रह जायें। अपने भीतर भरे पड़े हुए कचरे (गुस्से, अहंकार, घृणा, कुंठाओं, कुत्सित भावनाओं और लालसाओं) को साफ कर सकते हैं कि जब वे आयें तो आपके भीतर को रहने योग्य पायें। आप अपने ह्रदय को मंदिर बना सकते हो। वे जब आयें तब आयें, आप तो उनके अभिनंदन और स्वागत के लिए हर समय तत्पर रह ही सकते हैं। हमेशा से इसी तत्परता से तैयार रहना ही हमारी सही प्रार्थना है।

आप जब सरल-सहज हो जाते हैं, शून्य हो जाते हैं तब ही पूर्ण उतरने को राजी होता है। जब तुम शून्य हो जाते हो, पृथ्वी पर सर रख देते हो तो वँहा तीर्थ हो जाता है? जब तुम मिट जाते हो तो जो बचता है, मेरे अनुसार उसी का नाम ईश्वर है।

मन को शांति और सुकून देने वाली ठंडी शीतल पवन के झोंके, उनका दिव्य प्रकाश और उनके प्रसाद स्वरूप शुभता, सौभाग्य और मांगल्य सदा ही आपके जीवन और घर आंगन तक पहुंचता रहे, बरसता रहे इन्ही कामनाओं के साथ साथ आज मेरे आराध्य प्रभु जी से ये प्रार्थना भी है कि आप स्वस्थ रहें, सकुशल रहें, हमेशा प्रसन्नचित रहें और आपके घर-आंगन में खुशहाली एवं समृद्धि के अनेक नव दीप जल्दी से देदीप्यमान हों। मंगल शुभकामनाएं 💐

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