I Am Finally Thinking of Stopping to Care for Hearts That Barely Knew Mine Existed…

मैं आज भी सोचता हूँ कि कहीं मेरी कोई बात किसी को चुभ न जाए, फिर ख़याल आता है— जब मेरा दिल दुखा था, तब किसी ने पूछा था क्या?

यहाँ सब अपनी सफ़ाई, अपने बहाने देकर आगे बढ़ गए, किसी ने अपने कहे या किए का हिसाब रखा क्या?

जहाँ बताना ही पड़े कि दर्द कितना है, वहाँ यह बताना कि ‘दर्द है’… ज़रूरी है क्या?

फिर राजेश तुम क्यों भूल जाते हो कि एक दिल तुम्हारे पास भी है, भला अब भी इसका ख्याल करना… कोई गुनाह है क्या?

इसीलिए अब न खुद को कोसता हूँ, न दूसरों को समझाने बैठता हूँ… बुरा लगता है, लगने देता हूँ… . बस उनसे मिलना छोड़ देता हूं।

But wait… That’s not entirely true. I’m still learning. Still trying to drop the guilt of guarding hearts, emotions, feelings that never bothered to care & guard mine….

Leave a comment