रविवारीय प्रार्थना: “मैं कैसा दिख रहा हूँ?” इसकी चिंता करने के बजाय, इस बात का चिंतन करना कि “प्रभु को मेरे भीतर क्या दिख रहा होगा?”

ज्यादातर लोगों ने अपने जीवन को एक सजी-धजी सोशल मीडिया टाइमलाइन में तब्दील कर दिया है—जहाँ हर साँस केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए है और हर कार्य एक ‘लाइक’ बटोरने का विज्ञापन। हमने ‘दिखने’ की कला में इतनी महारत हासिल कर ली है कि अब हमारे नेक काम, हमारी करुणा और हमारी प्रार्थनाएं भी किसी दर्शक की मोहताज हो गई हैं। हमने चौबीस घंटे का एक मनमोहक मुखौटा ओढ़ लिया है। हमें बखूबी पता है कि कब दान धर्म का अभिनय करना है, कब प्रभावशाली शब्दों का जाल बुनना है और कब खुद को एक नायक की तरह पेश करना है। हम जानते हैं कि कब झुकना है ताकि लोग हमारी विनम्रता के कायल हो जाएं और कब प्रार्थना के सुर ऊँचे करने हैं ताकि समाज हमें बड़ा ज्ञानी और धार्मिक मान ले। लेकिन इस सामाजिक प्रदर्शन के बीच, हम यह भूल जाते हैं कि धर्म और अध्यात्म कोई सार्वजनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक एकांत यात्रा है – मौन की – भीतर से बाहर की।

ईश्वर आपके बाहरी दिखावे से कभी भी प्रभावित नहीं होते हैं। आपको जो ये लोगों से तालियां या गालियां मिल रही हैं उससे भी उनका कोई ज्यादा सरोकार नहीं है। जहाँ संसार हमारे कर्मों का और कहे शब्दों का आकलन करता है और अपनी प्रतिक्रिया देता है, वहीं ईश्वर उन के पीछे छिपी मंशा को, नियत को वजह को देखते हैं। इसे इस तरह समझें कि यदि आप किसी को जहर भी दे रहे हैं और उसके पीछे की नीयत उसे बचाने की है, तो परमात्मा की नजरों में वह ‘अमृत’ है। और यदि आप किसी को अमृत पिला रहे हैं ताकि आपकी महानता के झंडे गड़ें, तो वह अस्तित्व की नजरों में केवल ‘विषाक्त अहंकार’ है।

परमात्मा आपके ‘क्या’ में उत्सुक नहीं है, वह आपके ‘क्यों’ में है। आप मंदिर में सिर झुकाते हैं, दुनिया के लिये ठीक है। लेकिन परमात्मा इस झुके हुए सिर के पीछे की वजह को देख रहा है.. आप मौन रहते हैं, दुनिया बढ़िया कहती है। लेकिन परमात्मा देखता है कि इस मौन के भीतर कहीं कोई ‘चिल्लाता हुआ स्वार्थ’ तो नहीं छिपा है।

असल में आपकी नीयत ही आपकी सबसे बड़ी प्रार्थना है, कहे गए शब्द और किए कार्य नहीं।

यदि आप भीतर से अशुद्ध हैं और बाहर से चंदन लेप रहे हैं, तो आप दुनिया को तो सुगंधित कर सकते हैं, पर उस परम चेतना को नहीं, जो आपके लेप के पीछे छिपी हुई दुर्गंध को पहचानती है। और आज के लेख में, मैं आपको स्वयं को तनिक भी सुधारने (Improve) के लिये नहीं कह रहा हूं, बल्कि खुद को उघाड़ना (Expose) है उनके सामने और स्वय के सामने ये कह रहा हूं।

क्योंकि वे आपकी ‘गलतियों’ को माफ कर सकते हैं, लेकिन आपके ‘कपट’ को और पाखंड को नहीं। अहंकार को तो बिल्कुल नहीं। “आप आज कैसे लग रहे हैं” ये सवाल तो आपने स्वयं और अपने आसपास के लोगों से हजारों हजार बार किया होगा, आज इस रविवार को मैं केवल ये कह रहा हूं कि जब आप ईश्वर के सामने बैठ कर या खड़े खड़े ही घड़ी दो घड़ी उनका नाम लेते हैं तो बस उनसे यह पूछें कि “हे प्रभु, जब आप मुझमें झांकते हैं, तो आपको वहाँ क्या दिखाई देता है?” आपको हर बात का जवाब  मिल जायेगा। तुरंत समझ आ जाएगा कि वहां ऊपर आपके बही खाते में क्या लिखा जा रहा होगा। इस रविवार को अपने दो चार बढ़िया कामों के लिये अपनी पीठ थप थापने से पहले ये पूछें की उन कामों के पीछे मेरी नीयत क्या थी? बस सारा गणित चुटकियों में समझ आ जायेगा।

क्योंकि अंत में, यहां बटोरी लोगों की वाह-वाही यहीं मिट्टी में मिल जाएगी। आपकी प्रशंसा और साख के महल ढह जाएंगे। केवल वही बचेगा जो आपने पूरी ईमानदारी, निष्कपट तथा समर्पित भाव से कहा था या किया था।

निष्कपट, सरल, सहजवार अहोभाव से भरा हृदय ही आपको भगवत्कृपा का अधिकारी बनाता है बस आज मेरे आराध्य प्रभु जी से यही विनती है कि आपको ये बात समझ आ जाए। आपको समझ आ जाए कि इस मनुष्य होने के अपूर्व अवसर को ‘झूठ-ढोंग-दिखावे’ कि, अपने अहंकार की भेंट न चढ़ाएं, बल्कि इसे एक ऐसी सुंदर अभिव्यक्ति बना दें जिसे देखकर वह स्रष्टा भी मुस्कुरा उठे।

आपका हृदय सदा स्वस्थ और मस्त रहे, प्रफुल्लित और प्रेममय रहे तथा आपके आस पास की हर चीज खिलती रहे इन्हीं मंगल शुभकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

Leave a comment