रविवारीय प्रार्थना – बिना सोचे-विचारे अपने स्तर से नीचे गिर कर बेहोशी में कुछ भी कहने या कर गुजरने से बचना, ज्यादातर होश में रहना तथा अपने मूल दिव्य भाव में स्थिर रहना ही प्रार्थना है।

आज फिर रविवार है, चिंतन-मनन करने का दिन, थोड़ा ठहरकर अंतर्मन में झांकने का दिन। आज मैं आपके साथ जो विचार साझा कर रहा हूँ, वह न तो बहुत जटिल है और न ही इसे करने में कोई बड़ा प्रयास चाहिए। आज मैं आपसे केवल एक छोटा सा अनुरोध करता हूँ: कुछ पल के लिए शांत होकर बैठिए और विचार कीजिए कि जीवन में हमसे जितनी भी भूलें या गलतियाँ हुईं, उनका मूल कारण क्या था? यदि आप थोड़ी सी भी गहराई में उतरेंगे, तो एक ही सच सामने आएगा—उस विशेष क्षण में हमारे भीतर ‘होश’ (Awareness) का न होना, होंश खो देना।

वास्तव में, जब हम जीवन की अंधी आपाधापी, भय, प्रलोभन, लोभ लालच, क्षुद्र स्वार्थ सिद्धि या किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं, तब हमारी चेतना या होश खो सा जाता है। इसी बेहोशी की हालत में हमारी जुबान से ऐसे तीखे शब्द निकल जाते हैं, जो बाद में एक बड़ा बवंडर बनकर लौटते हैं। उस पल हम ऐसी प्रस्तुतियां दे बैठते हैं या ऐसा कुछ कर गुजरते हैं, जो सर्वथा अनुचित होता है; क्योंकि हम यह देखने की क्षमता ही खो देते हैं कि हमारी इस अनियंत्रित बातचीत, क्रिया या प्रतिक्रिया का परिणाम कितना घातक होने वाला है।

ऐसा नहीं है कि हमें पता नहीं है। आपकी अंतरात्मा सब जानती है क्या बोलना और करना उचित है और क्या अनुचित। आपके भीतर का चैतन्य तत्व, पहले से ही सब जानता है कि क्या धर्म है और क्या अधर्म। कमी ज्ञान, बुद्धि  या विवेक की नहीं है, कमी उन्हें आचरण में लाने की है – कमी आपकी बेहोंशी की है।

जब हम बिना सोचे-विचारे कुछ भी कह देते हैं या कर गुजरते हैं, तो असल में हम अपने वास्तविक स्तर से नीचे गिर जाते हैं। इस बेहोशी की अवस्था को पहचानना और खुद को होश में लाना – होश में बने रहना ही सच्ची प्रार्थना है। मेरे दृष्टिकोण में, प्रार्थना अपनी सोई हुई चेतना को जगाने का एक सचेत और जीवंत प्रयास है। यह स्वयं को टटोलने की वह आंतरिक प्रक्रिया है, जिससे हम अपनी बेहोशी और छुपी कमियों को पहचानकर न केवल होश में लौट सकें, बल्कि उस परम चेतना की उपस्थिति को भी अपने भीतर महसूस कर सकें।

जब हम हर पल जागरूक रहकर जीना सीख जाते हैं, तो हमारे अंदर एक कमाल का बदलाव आता है। तब हमारे मुँह से निकला हर शब्द मीठा और सच्चा बन जाता है, और हमारा हर काम किसी प्रार्थना जैसा पवित्र हो जाता है। याद रखिए, आध्यात्मिक उन्नति और परमात्मा की अनुभूति बाह्य आडंबरों या निर्जला व्रतों से नहीं, बल्कि साफ़ दिल, सच्चे इरादों और शांत मन से प्राप्त होती है।

आज मैं अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूं कि आप सदैव होश में रहें तथा आपके कर्म, शब्द और विचार आपकी अंतरात्मा के अद्वैत तत्त्व से जुड़े रह कर स्नेह, श्रद्धा और आत्मिक ऊर्जा से भरे रहें। आपको हर पल यह बोध बना रहे कि शुचिता, सौम्यता, सरलता, सहृदयता और तेजस्विता ही आपका मूल स्वभाव है। आप सदैव स्वस्थ और प्रसन्नचित रहें; आपके भीतर आत्मिक शुद्धि और शांति निरंतर बढ़ती रहे – इन्हीं सब मंगल शुभकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार।

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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