Manifestation • Mindset • Abundance • Blessings Your future self has brought you here. Time to Align, Attract & Evolve, Now🦸
हर सुबह जब हम आँखें खोलते हैं, तो सफलता की एक बंधी-बंधाई परिभाषा हमारे सामने आ खड़ी होती है — एक खुशहाल परिवार, समाज में रुतबा, करियर की नई ऊंचाई, अच्छा स्वास्थ्य और चारों तरफ वाहवाही। बेशक, ये सभी जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम हैं और इन्हें पाना भी ईश्वर की कृपा का ही संकेत है। किंतु, जिस वास्तविक सफलता और अंतिम लक्ष्य की चर्चा आज मैं अपने इस रविवारीय लेख में कर रहा हूँ, वह इससे कहीं अलग और गहरी है।
वह वास्तविक सफलता और लक्ष्य है – आज के इस आपाधापी से भरे और नैतिक रूप से भ्रमित करने वाले युग में, अपने पौराणिक एवं सनातन सिद्धांतों और मूल्यों पर निष्ठापूर्वक अडिग रहना। जब चारों ओर शॉर्टकट और अनैतिक समझौतों की अंधी दौड़ मची हो, तब इस अंधी दौड़ में खुद को खोने से बचा लेना ही सफलता है। आज जब छल-कपट, अनैतिकता, क्षुद्रता और चालाकी को दुनियादारी का एक ‘जरूरी हिस्सा’ मान लिया गया हो, तब स्वयं को उस कीचड़ से दूर रखना और अपने आचरण व व्यवहार की पवित्रता को बनाए रखना ही सच्ची सफलता है।
प्रारब्धवश परमात्मा ने हमें जो भी उत्तरदायित्व या कार्य इस सृष्टि में सौंपा है, उसका पूरी निष्ठा और कुशलता से संपादन करते हुए भी अपने चरित्र की शुद्धता और आत्मा की दिव्यता को बचाए रखना ही असली सफलता है। आस-पास चाहे कितनी भी नकारात्मकता, नीचता या अनैतिकता क्यों न व्याप्त हो, अपने अंतःकरण की सौम्यता, सरलता और सहृदयता को अक्षुण्ण बनाए रखना ही असली सफलता है। अपनी मर्यादाओं को लांघे बिना, जो अपनी कथनी और करनी को एक सुर में पिरोये रखता है, मेरे अनुसार तो वही असली श्रेष्ठता को प्राप्त कर पाता है।
जीवन और आध्यात्म के हर आयाम में सच्ची सफलता और भगवत्प्राप्ति के लिये आपके कर्म और पुरुषार्थ तो अनिवार्य है ही है, किंतु यह परम सत्य स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है कि अंतिम सिद्धि हमारे अहंकारगत पुरुषार्थ से नहीं मिलती। वह तो मात्र प्रभु के अनुग्रह और उनकी दिव्य प्रेरणा का उपहार है। अपने पुरुषार्थ को ईश्वर के चरणों में सौंप देने का यही शुद्ध बोध हमारी सच्ची प्रार्थना है।
अंत में, मैं अपने आराध्य प्रभु जी से विनती करता हूँ कि उनका अनन्य अनुग्रह और दिव्य कृपा आपकी प्रार्थना, साधन-समर्थता, बुद्धि और आपके आत्मबल के साथ एकाकार हो जाए जिससे कि आप जीवन के साधारण और निचले अनुभवों से ऊपर उठकर अपने ब्रह्मस्वरूप के रूप में स्थापित हो पाएं। स्मरण रहे कि वास्तविक सफलता का अंतिम शिखर भी यही है और इस सचराचार जगत में परमात्मा की अनुभूति करने का एकमात्र उपाय भी यही है कि हमारी वाणी, हमारा मौन, हमारे हर छोटे बडे काम और आचरण हमारे इस ब्रह्मस्वरूप की अभिव्यक्ति बन जाये।
आप सदैव स्वस्थ और प्रसन्नचित रहें; आपके भीतर आत्मिक शुद्धि, सौम्यता, सरलता, सहृदयता, सुकून और शांति निरंतर बढ़ती रहे – इन्हीं सब मंगल शुभकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार।
श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।
