रविवारीय प्रार्थना – अपने ब्रह्म स्वरूप को अपने रोजमर्रा के कार्यों में, बातचीत और आचरण में आगे रखना न कि अपने आदिम, शिकारी और बेचैन हिस्से को।

आज के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि हममें ज्ञान की कमी है। हमारी असली समस्या अज्ञानता नहीं, बल्कि क्रियान्वयन (execution) की है। ऐसा शायद ही कभी होता है जब हमें यह न पता हो कि सही क्या है; असली चुनौती तो उस सही बात को अमल में लाने की है। हम अक्सर खुद को इस दिलासे में रखते हैं कि सही बात की समझ होना ही उसे जी लेने के बराबर है। पर जरा सोचिए, क्या सिर्फ जानने और सोचने से ही सब ठीक हो जाएगा, या कुछ करना भी पड़ेगा? आज सोचिएगा जरूर 🤫।

दरअसल, हम सबके भीतर दो विरोधी प्रवृत्तियां एक साथ सांस लेती हैं। एक तरफ हमारे स्वभाव का वह आदिम और बेचैन हिस्सा है, जिसे आप एक ‘जंगली शिकारी’ कह सकते हैं। उसे दूर के किसी भविष्य या आत्मिक गरिमा से कोई सरोकार नहीं है। उसे बस अभी, इसी पल अपनी भूख मिटानी है— इसे तुरंत मज़ा चहिये, तारीफ चाहिये, किसी भी बहस में अपने अहंकार की जीत चाहिये। उसे कल की कोई फिक्र नहीं है; उसे तो बस आज का ‘डोपामाइन’ चाहिए। जब भी हम जाने – अनजाने में इस शिकारी स्वभाव को अपना राजा बना लेते हैं, तो हमारे सारे फैसले, काम, आध्यात्मिक लक्ष्य और सबसे खूबसूरत रिश्ते इसी की अतृप्त भूख की भेंट चढ़ जाते हैं।

लेकिन इस पाशविक प्रवृत्ति के ठीक दूसरी तरफ, हमारे भीतर एक बेहद शांत, शुद्ध और अनंत चेतना भी विराजमान है। यह हमारा वह ईश्वरीय अंश है, जो हमें लगातार अनुशासन, विवेक और आंतरिक गरिमा की याद दिलाता रहता है। इस आंतरिक प्रकाश-स्तंभ (lighthouse) से दोबारा जुड़ जाने की जादुई अवस्था का नाम ही शायद ‘प्रार्थना’ है।

इसीलिये मेरा मानना है कि प्रार्थना न तो अंतरिक्ष में बैठे किसी अदृश्य ईश्वर से बातचीत है, और न ही यह समय की कोई रहस्यमयी यात्रा है। यह तो अपने भीतर छिपे उच्चतम स्वभाव को जगाने, अपनी मूल प्रवृत्ति को पहचानने और उस ईश्वरीय अंश को महसूस करने की एक प्रक्रिया है। हमेशा याद रखें कि सच्ची आध्यात्मिक सफलता और कुछ नहीं, बस अपने इसी शाश्वत स्वरूप को फिर से पहचानना है और उसे अपने हर कार्य, बातचीत और रोजमर्रा के आचरण में आगे रखना है।

मैं उम्मीद करता हूँ कि आज का यह रविवारीय लेख आपको अपने भीतर झांकने पर मजबूर करेगा ताकि आप देख सकें कि इस वक्त आप के मन पर शासन कौन कर रहा है—वह बेचैन शिकारी या आपकी शांत और दिव्य उच्च चेतना। आशा है कि यह लेख आपके भीतर सोई हुई आत्मीय शक्तियों, दिव्यता और श्रेष्ठताओं को मुखर करेगा, ताकि आपके जीवन का प्रवाह पुनः धर्म, संतुलन और प्रकाश की ओर उन्मुख हो सके।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से यही प्रार्थना करता हूँ कि कोई भी नकारात्मक विचार—चाहे वह भीतर का हो या बाहर का—आपके स्वास्थ्य, सामाजिक दायित्वों और कार्यक्षमता को कभी भी प्रभावित न करने पाए। आपका जीवन प्रतिपल शुभता, सौंदर्य और दिव्यता से महकता रहे और आप जल्द ही अपने जीवन की अनंत संभावनाओं के शिखर को छू सकें। इन्हीं गहरी और आत्मीय मंगलकामनाओं के साथ, आपको सप्रेम नमस्कार! 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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