रविवारीय प्रार्थना – ‘कुछ होने’ और ‘कुछ पाने’ की इस अंतहीन ‘हाय-हाय’ को समाप्त कर, अपने अशांत चित्त को शांत करना और ‘सुकून, संतोष और शून्यता’ की ओर मुड़ जाना ही प्रार्थना है।

अगर आज मैं आपको बिल्कुल साफ़ शब्दों में बताऊँ—कि दुनिया क्या सोचती है और आपके आस-पास के लोग क्या कहते हैं, अगर उस शोर को एक पल के लिए छोड़ दिया जा—तो वास्तविक आध्यात्मिकता संसार में कुछ भी बटोरने या पा लेने की दौड़ नहीं है, बल्कि खुद को पूरी तरह खो देने का साहस है। ‘कुछ पा लेने’ का विचार तो असल में अध्यात्म का हिस्सा कभी भी नहीं था। सच तो यह है कि ‘कुछ होने’ (Somebody) के भ्रम से निकलकर, ‘कुछ न होने’ (Nobody या शून्य) की ओर बढ़ जाना ही वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा है।

लेकिन यह सत्य आपको इतनी जल्दी समझ नहीं आएगा, क्योंकि आपका जीवन तो ‘कुछ विशिष्ट बनने’ और “सबकुछ बटोरने’ की अंधी दौड़ पर टिका है। अगर यही खत्म यही दौड़ खत्म हो गई तो बचेगा क्या 🤫। और सच तो यह है कि यही चौबीस घंटे की अंधी दौड़ आपकी अशांति की असली जड़ है। अगर आप ज़रा ठहरकर खुद को गौर से देखेंगे, तो पाएंगे कि, आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, किसी भी महंगे से महंगे रेस्तरां में बैठ जाएं, मगर आपकी असली भूख नहीं मिटती, आपकी प्यास नहीं बुझती। हर उपलब्धि के बाद एक अजीब सा खालीपन घेर लेता है, और यही अधूरापन आपको लगातार बेचैन और अशांत बनाए रखता है।

तो आइए, आज इस रविवारीय संदेश को अपने भीतर की गहराइयों तक उतर जाने दीजिए। ज़रा ठहरकर आत्म-चिंतन कीजिए और साहस दिखाइए कि सालों-साल से ये जो आप ‘कुछ पाने’ और ‘कुछ बनने’ का असफल फॉर्मूला आज़मा रहे हैं, उसे आज केवल एक दिन के लिए सस्पेंड (suspend) कर दें—और ‘कुछ न होने’ के इस अनूठे आनंद में डूब जाएं। वास्तव में, प्रार्थना और कुछ नहीं, बल्कि खुद को भीतर से पूरी तरह म्यूट (mute) और साफ़ कर लेने की एक पवित्र प्रक्रिया है। यहअपने ही बनाए मुखौटों को उतार फेंकने का उत्सव है, जो हमारे अशांत चित्त को थाम लेता है। यही वह आंतरिक साधना है जो आपको परम जीवंतता, एक गहरी जागरूकता और एक अत्यंत उज्ज्वल चेतना के आलोक से भर देती है।

मगर यहाँ एक बहुत बड़ा भ्रम साफ़ कर लेना ज़रूरी है—खुद को ‘खो देने’ या ‘शून्य हो जाने’ का मतलब यह कतई नहीं है कि आप अपनी व्यावहारिक ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर किसी काल्पनिक दुनिया में भाग जाएं। पलायनवाद अध्यात्म नहीं, बल्कि कायरता का दूसरा नाम है। असली अध्यात्म तो यह है कि आप पूरे होश, गहरी ईमानदारी और निश्छल प्रेम के साथ संसार के इस रंगमंच पर अपनी हर भूमिका को पूरी उत्कृष्टता से निभाएं, लेकिन भीतर से इस भाव में रहें कि आप सिर्फ एक अभिनेता (Actor) हैं, मालिक नहीं। असली चुनौती दूर पहाड़ों पर किसी गुफा में बैठ में शांत बैठने की नहीं है; असली कला तो इस जीवन के बाज़ार, रोज़मर्रा की आपाधापी और हर दिन के खटराग के ठीक बीच में खड़े होकर भी अपने भीतर की अंतःशांति, सुकून और संतोष की भावना को अक्षुण्ण बनाए रखने की है। जब तक आपकी शांति बाहरी परिस्थितियों की गुलाम है, तब तक वह केवल एक मुखौटा है। जिस दिन आप इस पूरे कोलाहल के मध्य में भी भीतर से उतने ही अनछुए और अतींद्रिय रह पाएंगे जैसे पानी में रहकर भी कमल रहता है, उसी दिन समझिएगा कि आपने किताबी बातों को केवल किताबों में दोहराया नहीं है, बल्कि अपनी रगों में उतारा है।

आज मैं अपने आराध्य प्रभु से यही विनती करता हूँ कि आपके जीवन के ये तमाम आत्म-निर्मित संघर्ष अब हमेशा के लिए समाप्त हो जाएं। आपको ‘कुछ होने’ के भ्रम से मुक्ति मिले और ‘कुछ न होने’ के शून्य में जो परम आनंद है, वो जल्द ही समझ आने लगे। और आपकी अंतहीन इच्छाओं की जिस अंधी दौड़ ने आपके और दूसरों के जीवन में ‘हाय-हाय’ पैदा कर रखी है, उसका जल्द ही पूर्ण अंत हो जाए, ताकि आपका अंतःकरण निर्मल हो सके और आपके भीतर शांति, श्रद्धा तथा आत्मबोध का दिव्य प्रकाश आलोकित हो उठे।

प्रभु की असीम अनुकम्पा आप सभी आध्यात्मिक साथियों पर बनी रहे, आप सदा स्वस्थ, प्रसन्नचित्त रहें और आपकी आध्यात्मिक चेतना का लगातार विस्तार हो, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ, आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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