रविवारीय प्रार्थना: अपने मन और वृत्तियों को पूर्ण नियंत्रण में रखते हुए, नैतिक कर्तव्यबोध से सराबोर रहना; तथा आत्मोन्नति, चित्तशुद्धि और ब्रह्मानुभूति के मार्ग पर अविराम अग्रसर रहना।

आज रविवारीय चिंतन में एक विस्मयकारी बात बताता हूं – हम सब स्वयं से परे जाना चाहते हैं, अपने ‘मैं’, अपने छोटे-मोटे स्वार्थ, डर, अज्ञान और आराम के दायरे से बाहर निकलकर किसी महान उद्देश्य या परम सत्य से जुड़ना चाहते हैं, मौजूदा स्थिति, सोच या सीमाओं की दीवार को तोड़कर एक ऊंचे स्तर (higher level) पर पहुँचना चाहते हैं। मुझे आपका तो पता नहीं पर ज्यादातर लोगों के डीएनए (DNA) या अंदरूनी बनावट (human design) में ही ये बात या चाहत शामिल है…

लेकिन विडंबना यह है कि हम ऐसा कर नहीं पाते।

हम ‘मैं-मेरा’ के फेर में और क्षणिक भौतिक सुखों में इतने उलझे रहते हैं कि ऊपर उठ ही नहीं पाते हैं; और जिस रूपांतरण का, जिस लक्ष्य का, जिस श्रेष्ठ संभावना को साकार करने का हम सपना देखते हैं, वह मात्र एक विचार बनकर रह जाता है। आत्मा उच्चता की ओर उड़ना चाहती है, किंतु मन हमें पुनः नीचे खींच लाता है।

आध्यात्मिक जीवन में अपनी इस असफलता से निराश होना सबसे बड़ी भूल है। क्योंकि सही मायने में आध्यात्मिक जीवन तब शुरू नहीं होता जब आप पूरी तरह बदल जाते हैं, बल्कि तब शुरू होता है जब आप इन दोनों बातों को सच्चे मन से स्वीकार कर लेते हैं—पहली, ऊपर उठने की आपकी गहरी तड़प; और दूसरी, आपका अपना मानवीय लाचारी और स्वभाव।

जब आप आत्मा और मन के इस आंतरिक द्वंद्व को समझ लेते हैं, तो आपकी सीमित ऊर्जा और संकुचित चेतना स्वतः ही विशाल होने लगती है। वह आपको किसी ऐसे परम उद्देश्य की ओर प्रेरित करती है जो आपके अस्तित्व से कहीं अधिक विराट है—चाहे वह ईश्वर की अनन्य भक्ति हो, कोई गहन आध्यात्मिक विचार हो, या फिर मानवता की निस्वार्थ सेवा करते हुए भावी पीढ़ियों के लिए इस संसार को और सुंदर बनाने का संकल्प।

इसीलिए मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रार्थना केवल कोई तकनीक या नियम नहीं है। यह तो इस उपहार स्वरूप मिले हुए जीवन का अनुग्रहपूर्वक आनंद लेते हुए, अपने चित्त को विनम्रता, करुणा और नैतिक कर्तव्यबोध से सराबोर कर लेना है। यह श्रीमद्भागवत गीता और श्रीरामचरितमानस के ईश्वरीय वचनों और सीखों को अपने जीवन का मार्गदर्शक बनने देना है; ताकि हम संकुचित दायरे से निकलकर परम सत्य और अपने उच्चतम स्वरूप से एकाकार हो सकें।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु जी से प्रार्थना करता हूं कि उनकी असीम कृपा आप पर निरंतर बरसती रहे। आप आत्मोन्नति, चित्तशुद्धि और ब्रह्मानुभूति के मार्ग पर अविराम अग्रसर रहें। आपकी मनःस्थितियाँ और वृत्तियाँ आपके पूर्ण नियंत्रण में रहें, जिससे आपकी श्रेष्ठतम संभावनाएँ पूर्णता से साकार हो सकें।

आपका हृदय सदा स्वस्थ, मस्त, प्रफुल्लित, प्रेममय रहे और दिलोदिमाग आत्म-शांति, नए दृष्टिकोण और असीम आनंद से भरे रहे, इन्हीं मंगल शुभकामनाओं के साथ, आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।

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