Manifestation • Mindset • Abundance • Blessings Your future self has brought you here. Time to Align, Attract & Evolve, Now🦸
मित्रों, राम राम। आज रविवार की सुबह फिर कुछ बातें, जो श्रेष्ठ जनों ने कही और लिखी हैं, उन्हें गहराई से समझने और अपने जीवन में उतारने के लिए लिखी हैं। हर रविवार मैं इन शब्दों को आप तक पहुँचाता हूँ ताकि हम सब मिलकर अपनी चेतना को और ऊँचा उठा सकें तथा अपने चिंतन और मनोभावों की ताजी स्थिति समझते हुए उन्हें परिष्कृत कर सकें। मेरा यह प्रयास केवल एक लेख लिखना नहीं है, बल्कि उन बातों को साझा करना है जिन्होंने मुझे प्रभावित किया है और जिन्हें या तो मैं अपने जीवन में उतार चुका हूँ या उतारने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ।
आज का यह लेख एक मामूली सी लेकिन असाधारण बात को समझने के लिए है – वो ये है कि किसी भी इंसान की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके हाथ में क्या है या वह बाहर से कैसा दिख रहा है, बल्कि इस बात से होती है कि उसके भीतर कैसी ऊर्जा बह रही है और उसकी सोच कैसी है। इस संसार में हम दो तरह की चेतनाओं को देखते हैं—एक वह जो ‘मानसरोवर’ की तरह खुश, शांत और शीतल है, और दूसरी वह जो ‘ज्वालामुखी’ की तरह क्रोध, अशांति और ईर्ष्या से धधक रही है। यह फर्क सिर्फ स्वभाव का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि हमने अपने भीतर ‘परमात्मा’ को जगह दी है या अपने ‘अहंकार’ को।
जब कोई व्यक्ति भीतर से सहज और सरल हो जाता है, तो उसका पूरा अस्तित्व एक जीवंत प्रार्थना बन जाता है। उसके लिए जीवन का हर पल परमात्मा का प्रसाद है। ऐसा व्यक्ति यदि युद्ध के मैदान के बीच भी खड़ा हो, तो उसकी आत्मा में मंदिर जैसी शांति बनी रहती है। वह जो भी करता है, उसके पीछे नफरत नहीं बल्कि एक गहरा ‘अहोभाव’ होता है। उसके हाथ में अगर तलवार भी आ जाए, तो वह विनाश के लिए नहीं बल्कि सृजन और मर्यादा की रक्षा के लिए, ईश्वर का आदेश मानकर उठेगा। उसका बल और उसकी बुद्धि हमेशा दैवीय और मंगलकारी होती है, क्योंकि उसका ‘मैं’ और उसका अहंकार मिट चुका है और केवल परमात्मा की इच्छा ही शेष है।
वहीं दूसरी ओर, जिस व्यक्ति के भीतर तुलना, श्रेष्ठता और घृणा का अंधकार व्याप्त है, जो या तो ‘सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स’ (श्रेष्ठता की ग्रंथि) से ग्रसित है या ‘इन्फीरियरिटी कॉम्प्लेक्स’ (हीन भावना) से, उसके लिए संसार का सबसे पवित्र स्थान भी एक युद्धभूमि बन जाता है। वह किसी प्रसिद्ध और सिद्ध मंदिर में माला लेकर बैठ तो सकता है, लेकिन उसके विचार किसी को नीचा दिखाने या स्वयं को बड़ा सिद्ध करने की साजिशों में उलझे रहते हैं। ऐसे अशांत व्यक्ति के हाथ में अगर एक छोटा सा पत्थर भी हो, तो वह परिवार और समाज के लिए घातक साबित होता है।
आज मेरे आराध्य प्रभु जी से मेरी यही विनती है कि आप उन तमाम मानसिक उलझनो, ग्रंथियों और उस कूड़ा करकट को जिसे आपने अपने अंदर भर लिया है उन सब से मुक्त होकर उस सोच और चेतना के स्तर को पा जाएँ, जहाँ आपका हर शब्द और हर कर्म एक जीवित प्रार्थना बन जाए। आपकी मनोदशा, मनोभाव और गतिविधियों से न केवल आपका जीवन, बल्कि आपके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति भी धन्य हो जाए। आप जहाँ भी कदम रखें, वहाँ सुकून और खुशहाली की महक और रौनक फैल जाए।
स्वस्थ रहिये, खूब खुश रहिए, खिलखिलाते रहिए और अपनी रूह की चमक से इस दुनिया को रोशन करते रहिए। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आपको प्यार भरा नमस्कार।
श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।
