Manifestation • Mindset • Abundance • Blessings Your future self has brought you here. Time to Align, Attract & Evolve, Now🦸
रविवार की शांत सुबह मेरे लिये आत्म-चिंतन का निमंत्रण होती है। यह वह समय है जब मैं उन अनुभूतियों को – बातों को समझने और शब्द देने की कोशिश करता हूँ, जो किसी अदृश्य ऊर्जा, पितरों, गुरु-सत्ता या उस ‘बोधिसत्व चेतना’ की प्रेरणा से मुझ तक पहुँचती हैं। सच तो यह है कि मैं खुद कुछ नहीं लिख रहा होता, मेरे हाथ तो बस एक जरिया बन जाते हैं आपके लिए उन संदेशों को साझा करने का। कहने और लिखने को तो मन में बहुत कुछ अधूरा पड़ा रहता है, लेकिन जब तक वह दिव्य चेतना और प्रेरणा मुझे अपनी पकड़ में नहीं ले लेती, तब तक शब्द बाहर नहीं आते। वे बस भीतर कहीं चुपचाप सही समय का इंतज़ार करते रहते हैं।
आज वही दिव्य चेतना मुझे एक बहुत बड़ी बात—एक गहरा फर्क समझाती है। यह वही अंतर है जो एक सफल, आध्यात्मिक और सच्चे धार्मिक इंसान को हमसे अलग करता है। हम अपनी अधिकांश ऊर्जा और समय बस इस बात को साबित करने में नष्ट कर देते हैं कि हम ‘सर्वश्रेष्ठ’ हैं। हम पूरी दुनिया को यह दिखाने के संघर्ष में दिन रात लगे रहते हैं कि हम बहुत ऊँचे, समझदार, कुशल और पूर्ण हैं। जबकि कड़वी वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है—हम सब गहरे अज्ञान में हैं, मानो बिल्कुल अंधे हों और बस रास्ता टटोल रहे हों। हमारा अहंकार हमें इस सच को स्वीकार करने की अनुमति ही नहीं देता, जबकि एक सफल और जागृत व्यक्ति इसके बिल्कुल उलट, अपनी सीमाओं और अज्ञानता को गहराई से समझता है।
जब भी आपसे कोई गलती होती है, तो आपकी ‘सफाई’ देने की कला देखते ही बनती है। आप इतनी चालाकी से ‘परिस्थितियों’ को दोष दे देते हैं कि आपका अहंकार बिल्कुल साफ-सुथरा और सुरक्षित बचा रहे। आप बड़ी चतुराई से खुद को (Doer) बचा लेते हैं और सारा ठीकरा बेचारे ‘हालात’ या ‘कर्म’ के सिर पर फोड़ देते हैं। आप कहते हैं, “गुस्सा आ गया” या “गलती हो गई,” मानो यह आप पर बाहर से गिरा कोई आसमानी कहर हो जिसे आप रोक ही नहीं सकते थे। सच तो यह है कि आप यह मानने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते कि आप अंधेरे में भटक रहे थे। आप यह स्वीकार करने के बजाय कि आप खुद किसी गहरे नाले में गिरे हैं या दीवार से सिर टकराया है, सारा दोष उस नाले या दीवार की ‘गलत जगह’ होने पर मढ़ देते हैं।
सच तो यह है कि यदि आपको पूर्णतः आपके ही अहंकार, धुंधली दृष्टि और सीमित बुद्धि के सहारे छोड़ दिया जाए, तो आप अनजाने में स्वयं का ही विनाश कर बैठें। यह आपके पूर्व जन्मों के संचित पुण्यकर्मों और पुर्वजों’ की असीम अनुकंपा ही है, जो आपको बार-बार सही मार्ग पर ले आती है और भटकने से बचाती है।
अपनी सीमाओं, मूर्खता, अंधेपन और अज्ञानता को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा की पहली और सबसे अनिवार्य सीढ़ी है। अपनी कमियों को ईमानदारी से स्वीकार करना ही वह द्वार है जहाँ से ‘आस्था’ का जन्म होता है। जिस क्षण आप उस परम सत्ता के सम्मुख सच्चे मन से यह मान लेते हैं कि “प्रभु, मैं नहीं जानता, मुझे मार्ग दिखाइए”, बस तभी बुद्धि में विवेक का दिया जलना शुरू हो जाता है और अंधकार दूर होने लगता है।
इसीलिए बस यही समझ बनाए रखना कि उनकी भक्ति का आधार सर्वश्रेष्ठ होना नहीं, बल्कि अपनी भूलों और गलतियों के प्रति जागरूक होना है, हमारी सर्वोच्च प्रार्थना है।
इसीलिए आज के इस दिव्य चेतना से प्रेरित लेख के माध्यम से मै आहवान करता हूं कि आप आज इस थोथे दिखावे के बोझ को उतार फेंकें कि आप तो सर्वश्रेष्ठ हैं और आप सब जानते हैं। जब आप अपनी समस्त कमियों और निश्छलता के साथ परमात्मा के सामने झुकते हैं, तो वे अपनी उपस्थिति को अपने नामजप की कोमलता में ही प्रकट करने लगते हैं। याद रखिये कि प्रभु कृपा का और उनका अनुभव करने के लिए बस अपने अहंकार को छोड़कर सहजता, सरलता और समर्पण का हाथ थामने की देर है।
मेरे आराध्य प्रभु से आज यही विनती है कि आज आपको यह समझ आ जाए कि आध्यात्मिक यात्रा में सबसे प्रथम है – अन्त:करण की पवित्रता, निश्चलता और प्रार्थना। वे हमारे ज्ञान या हमारी चतुराई या निपुणता नहीं देखते हैं; वे तो हमारी उस समझ, हमारे उस धैर्य और अटूट दृढ़ प्रयासों को देखते हैं जिससे हम खुद को भीतर से परिष्कृत कर शुभत्त्व, देवत्व और सदप्रवृत्तियों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे होते हैं।
मेरी उनसे आज ये भी प्रार्थना है की आप हमेशा हंसते और खिलखिलाते रहें, स्वस्थ रहें तथा आपके घर-आंगन में सदा शुभता और मांगल्य की वर्षा होती रहे। मंगल शुभकामनाएं 💐
श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।
