रविवारीय प्रार्थना – क्या आपका अस्तित्व और चेतना वास्तव में स्वतंत्र है या पुरानी धारणाओं, कुरीतियों, आदतों और संकीर्ण प्रवृत्तियों नें आज भी उसे गुलाम बना रखा है।

आज का ये रविवारीय लेख उन साधकों को समर्पित है, जो जीवन के गहरे रहस्यों को भेदकर सच्ची आध्यात्मिक स्वाधीनता पाना चाहते हैं, तथा आनंद, परम शांति और मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने की अभिलाषा रखते हैं।

कल हमने पूरे गौरव के साथ 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया—तिरंगा फहराया, राष्ट्र की संप्रभुता को नमन किया और आज़ादी का महापर्व जिया। यह उत्सव आवश्यक भी था और वंदनीय भी, क्योंकि स्वाधीनता से बड़ा न कोई आनंद है, न कोई उपलब्धि। किंतु राष्ट्रीय पर्व के बाद, आज की यह शांत सुबह एक गहरा प्रश्न सामने रखती है—क्या देश के स्वतंत्र होने के साथ-साथ हमारा अपना अंतर्मन भी सचमुच स्वतंत्र हो पाया है?

हम स्वतंत्र देश के नागरिक तो बन गए, परंतु व्यक्तिगत रूप से आज भी हम अपनी पुरानी आदतों, पुराने दुखों और पुराने निष्कर्षों, हजारों साल पुराने ढर्रे, मानसिकता, अंधविश्वासों, कुरीतियों और विकारों के बंधक बने हुए हैं। हम जन्म से मृत्यु तक वही पुरानी शिकायतें, मिथ्या अहंकार, वही संकीर्ण पूर्वाग्रह, वही राग-द्वेष, भय, क्रोध, तृष्णा और वही नित्य का मानसिक कोलाहल ढोते रहते हैं। समाज जैसा सोचने और जीने को कहता है, हम बिना सवाल किए वैसे ही ढल जाते हैं—एक जीवंत चैतन्य होने के बजाय महज़ व्यवस्था का एक सामाजिक पुतला बनकर रह जाते हैं।

आपका तो मुझे पक्का पता नहीं है लेकिन हममें से अधिकांश अभी भी गुलाम ही हैं और केवल एक बीज की आरंभिक अवस्था में ही अटके हैं; फलदार वृक्ष बनना अभी बहुत दूर है। डर है कि जिस चेतना को स्वतंत्र होकर विकसित होकर परमात्मा रूपी विशाल वृक्ष बनना था, वह गुलामी की सोच, नकारात्मक विचारों, आलस्य, घृणा, ईर्ष्या, भय, अज्ञान और अंधविश्वास की मिट्टी में दबी न रह जाय। यह डर वास्तविक है कि कहीं जीवन अपनी परम संभावना को छुए बिना, एक अनखिले बीज के रूप में ही समाप्त न हो जाए।

इसीलिए मेरा मानना है कि प्रार्थना केवल कुछ शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने का एक सजग और दैनिक प्रयास है। व्यर्थ के प्रपंचों, कोलाहल, उन सभी अंधविश्वासों और प्रवृत्तियों से आत्मा को मुक्त करने का नाम प्रार्थना है, जिन्होंने आपकी आत्मा की मौलिकता को अभी भी जकड़ रखा है। अपनी चेतना को उसके परम, स्वतंत्र और प्रस्फुटित रूप में प्रतिष्ठित करना ही हमारी सबसे बड़ी प्रार्थना है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु के चरणों में यह विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि हमारा संपूर्ण अस्तित्व (शरीर, प्राण, मन और अंतःकरण) उन समस्त संकीर्णताओं, भय, जड़ता, रूढ़ियों और ऐतिहासिक आघातों की काली छाया से सदा के लिए मुक्त हो जाए, जो हमें आज भी भीतर से गुलाम बनाए हुए हैं।

आप स्वस्थ रहें, प्रसन्नचित रहें, ऊर्जावान रहें तथा अपने विशुद्ध, शाश्वत और स्वतंत्र आत्मतत्व में प्रतिष्ठित रह कर, अपने आराध्य के प्रति अहोभाव में भरे रह कर अपने भीतर और बाहर स्वर्ग के निर्माण में सतत संलग्न रहें, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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