रविवारीय प्रार्थना – जो पता है कि ग़लत – अनुचित है—उसे कहना और करना बंद कर श्रेष्ठ की ओर बढ़ना तथा जहाँ हैं, जिनके साथ हैं उन्हीं में अपने प्रभु को देखना – यही प्रार्थना है।

आज आपको एक मज़ेदार बात बताता हूँ—न तो आप ईश्वर हुए जा रहे हैं और न ही आपको उनका कोई अनुभव हो रहा है। बुरा मत मानिएगा लेकिन ये जो जन्म-जन्मांतर की प्रक्रिया, अंतहीन यात्रा और खोज है, वह इस बार भी ख़त्म होने नहीं जा रही 🫣

मुझे आपका तो पक्का से पता नहीं लेकिन आज के ज्यादातर इंसान जितने दीक्षित हैं वे पहले कभी नहीं थे। आज हमारे जितना ज्ञान है और समझ है, उतना पहले कभी नही था; पर फिर भी ढाक के वही तीन पात। हमें, हमारे मन को और हमारी आत्मा को भली-भाँति पता है कि क्या सही है और क्या ग़लत, कौन ठीक है और कौन ग़लत। हमें यह भी पता है कि ईश्वरीय अनुभव कहाँ होना चाहिए और कैसे होगा। हम यह भी रटते हैं कि अंधकार से आलोक की ओर जाना है, मृत्यु से अमृत की ओर और असत्य से सत्य की ओर जाना है; लेकिन असल में जाना किसे है 🤫?

हमें तो बस दिखावा करना है, पाखंड करना है। अपनी तात्कालिक सुविधा, आलस्य, लोभ-लालच और अहंकार के वशीभूत होकर ज्यादातर काम तो ग़लत ही करने हैं, और ऊपर से बहाना यह बनाना है कि “हमें पता ही नहीं था”। इसीलिए हममें से किसी को भी वास्तव में यह पूछने का हक़ नहीं है कि क्या सही है और क्या ग़लत, क्योंकि हम सब भीतर से पहले से ही जानते हैं कि क्या उचित है और क्या अनुचित। हो सकता है कि आप बहुत दूर तक का न जानते हों, हो सकता है कि आप पूरी तरह शुद्ध रूप से न जानते हों, लेकिन कुछ तो जानते ही हैं न? मैं बस इतना पूछ रहा हूँ कि जितना जानते हैं, पहले उस पर ही अमल क्यों नहीं कर रहे हैं 🤔?

भई, मान लिया कि आपको नहीं पता होगा कि ब्रह्म असल में क्या है या श्री हरि वास्तव में कंहा किस तीर्थ में निवास करते हैं या फिर की उस पार असल में क्या है; पर सच-सच बताइए, इतना तो पता है न कि इस वक़्त जो मैंने लिखा है, वह ठीक है या आपको सही लग रहा है? तो फिर ब्रह्म कहाँ है और क्या है के चक्कर में पड़ने की बजाय, अपने भीतर मौजूद उस ब्रह्म-अंश को जगाना, उसे उस घर में महसूस करना जहाँ आप दिन-रात साँस लेते हैं, और उन इंसानों के चेहरों में देखना जिनके साथ आप चौबीसों घंटे उठते-बैठते हैं (न कि पहाड़ों जंगलों में) — ये तो आप कर ही सकते हैं। जो वेद पुराणों में लिखा है वो न कर सकें कोई बात नहीं लेकिन जो करें वो सही करें – वे सत्कर्म हो ये तो कर ही सकते हैं बस यही आपके लिए प्रार्थना है।

बात समझ रहे हैं न? जितना थोड़ा-बहुत पता है, पहले उस पर तो चलिए! आज के इस रविवारीय लेख का उद्देश्य बस इतना ही है—चलो माना कि रोशनी कम है और बहुत दूर का रास्ता नहीं दिख रहा, पर इतना तो साफ़ दिख रहा है न कि दो-चार कदम आगे बढ़ाए जा सकें? कम से कम जहाँ तक दिख रहा है, वहाँ तक तो पूरे होश से चलिए, आगे की आगे देखेंगे। अभी जो ठीक लग रहा है, कम से कम उस पर तो अमल करिए। जो पहले से पता है कि ग़लत है, अनुचित है, स्तरहीन है—उसे कहना और करना तो बंद कीजिए। जब यह समझ आ ही गया है कि हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं, तो उस तरफ़ और आगे बढ़ना तो तुरंत रोका ही जा सकता है उसमें भला क्या परेशानी है 🤔?

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि उनके आशीर्वाद से आपके भीतर उन भूलों को सुधारने का सामर्थ्य और साहस आए, जो अतीत में हो गईं। ईश्वर आपको वह विवेक दें कि आज से कुछ भी अनुचित न हो, आप सही दिशा में कदम बढ़ा सकें, और आपको प्रतिदिन श्रेष्ठ बनने, श्रेष्ठ पाने तथा श्रेष्ठ कर्म करने के असीम अवसर मिलें जिनका आप पूरा लाभ उठा सकें।

आप जहां भी हैं, जिन अपनों के बीच भी हैं, वहीं आपको, उन्हीं सब में प्रभु की दिव्य उपस्थिति का अहसास और अनुभव होने लगे। आप सदा स्वस्थ, शांत और प्रसन्नचित्त रहें तथा इस बार के पितृपक्ष में अपने सत्कर्मों, सद्भाव और विवेकपूर्ण आचरण से ईश्वरीय सामर्थ्य संपन्न अपने पूज्य पितरों की सच्ची प्रसन्नता और गौरव का कारण बनें। इन्हीं शुभ मंगलकामनाओं के साथ, आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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