रविवारीय प्रार्थना: मन को अनुचित से मोड़कर सन्मार्ग पर लाना, अपने चिंतन और आचरण को उत्कृष्ट बनाना और आत्मतत्त्व को जागृत करना ही प्रार्थना है।

हर रविवार जब मैं कुछ लिखता हूँ, तो केवल वही बात साझा करता हूँ जो जीवन के अनुभवों से मेरी समझ में आई है—और जिसे हर संवेदनशील और समझदार इंसान को समझना ही चाहिए 🤫

कहा गया है कि जैसे फूल में सुगंध, तिल में तेल, लकड़ी में आग, दूध में घी और गन्ने में गुड छिपा रहता है, ठीक वैसे ही आपमें, मुझमें और हर प्राणी में वही एक आत्मतत्त्व (ईश्वर) मौजूद है। बाहर से देखने पर हमारे रूप, पद, कर्म और हालात भले ही अलग-अलग लगें, पर भीतर सबमें वही एक चेतना सांस ले रही है। हमारी सनातन परंपरायें, मान्यताएं, धार्मिक ग्रंथ, शास्त्र और सारा ज्ञान हमें इसी एक बात को समझाता है।

संसार के सारे साधन जुटा लेना ही इस जीवन की एकमात्र सफलता नहीं है। वास्तविक उन्नति तब है जब हमारा स्वभाव और आचरण शुद्ध हो जाए अपने आत्मस्वरुप के अनुसार हो जाए। जिस क्षण से आपका मन स्वाभाविक रूप से अनुचित से विमुख होकर सन्मार्ग की ओर मुड़ने लगे समझिये कि आपकी आध्यात्मिक यात्रा आरंभ हो गई।

आज ज़्यादातर लोग आँख मूँदकर बस “खाओ, पियो और ऐश करो” के पीछे भाग रहे हैं। न समाज की परवाह, न परिवार की मर्यादा, न धर्म और कर्म का कोई होश। अगर जीवन का मकसद सिर्फ पेट भरना, सोना और मौज करना ही है—तो फिर यह सब तो पशु भी बिना किसी तामझाम के कर लेते हैं 🫣 फिर इंसान होकर इतना दिखावा और पाखंड क्यों? फिर गीता और रामायण की बातें क्यों? और फिर यह ढोंग क्यों कि मरने के बाद क्या होगा? जब सामने दिखती ज़िंदगी की सच्चाई ही समझ नहीं आ रही, तो फिर ज्ञान की बातें करने का क्या फायदा? इतनी बुनियादी बात समझने के लिए किसी बहुत बड़े विद्वान होने की ज़रूरत नहीं है।

इसलिए मेरा मानना है कि हमारे लिए सबसे पहली प्रार्थना यही होनी चाहिए कि हम यह जानें और मानें कि हम सब में जो आत्मतत्त्व (आत्मा) है, वह उसी शाश्वत, सनातन और अनंत का स्वरूप है, जो इस सृष्टि के रचयिता और पालनकर्ता हैं। बस इसी विशुद्ध आत्मतत्त्व का ध्यान करने और अपने आचार-व्यवहार व स्वभाव को इस आत्मज्ञान के अनुरूप ढालने से ही हम इस संसार रूपी भवसागर को पार कर सकेंगे। हमेशा याद रखिये कि केवल आत्म-चिंतन और ईश्वर-चिंतन ही आत्म-कल्याण तथा आध्यात्मिक उन्नति का एकमात्र मार्ग है दूसरा कुछ भी नहीं।

आज मेरे आराध्य प्रभु से यही प्रार्थना है कि अपनी आत्मा से  परमात्मा के सनातन व शाश्वत संबंध की समझ आपके चिंतन, कर्म, व्यवहार, स्वभाव और आचरण को नई ऊँचाई दे और आपके इस बार के जीवन को सच्ची सार्थकता प्रदान करे।

आप सदा स्वस्थ, शांत और प्रसन्नचित्त रहें – इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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