ध्यान है न, परलोक सुधारना काम है—न कि उसे खराब करना 🤭

रविवार की शांत सुबह अक्सर मुझे पूजा-पाठ, परंपराओं, आध्यात्मिकता, धर्म और प्रार्थनाओं की ऊपरी परतों को हटाकर उनके मूल सत्य को तलाशने की प्रेरणा देती है। मन के भीतर जो बात गहराई से छू जाती है, वही यंहा लिख देता हूँ—इस विश्वास के साथ कि शायद यह आपकी जीवन यात्रा को भी थोड़ा अधिक सहज, शांत, आनंदमयी और सार्थक बना सके।

दुनिया ने ईश्वर की जो तस्वीर हमारे ज़हन में गढ़ी है, उसे आज इस पल के लिए किनारे रख दीजिए। ईश्वर कोई सिंहासन पर बैठा व्यक्ति नहीं है जो खुशामद से पिघल जाए, चढ़ावे से मान जाए या किसी खास का लिहाज कर ले। उसके दरबार में न कोई पसंदीदा है, न किसी की पैरवी चलती है।

आपको हो सकता है ये ठीक न लगे लेकिन मेरे अनुसार तो ईश्वर कोई एक व्यक्ति नहीं, एक शाश्वत व्यवस्था है। और इसी ब्रह्मांडीय व्यवस्था, ऊर्जा और कर्म के अचूक विधान को हमारे पूर्वजों ने ‘धर्म’ कहा था।

अग्नि का धर्म तपाना है, पानी का शीतलता देना। वे किसी के चेहरे को देखकर अपना स्वभाव नहीं बदलते। ठीक वैसे ही, यह पूरा अस्तित्व कुछ अटल नियमों से बंधा है। जब आपका विवेक, आपकी सोच, आपके आचार- विचार और आपका कर्म इस विधान के अनुकूल हो जाते हैं, तो पूरा ब्रह्मांड आपकी पीठ थपथपाने लगता है। आपका लोक परलोक सुधरने लगता है। लेकिन जैसे ही आप अहंकार, लोभ लालच या अपनी जड़ता, पुरातन पशुता और नकारात्मकता में इस प्रवाह के विपरीत तैरने की ज़िद करते हैं, तो आप खुद अपने हाथों अपने लिए नरक गढ़ने लगते हैं। इसमे कोई गहरी बात नही छुपी है।

ये आपके ईश्वर का आपसे खुश होना और नाराज़ होना नहीं है। आईने के सामने जैसा रूप लेकर खड़े होंगे, अक्स वैसा ही दिखेगा। बीज बबूल का बोकर आम की उम्मीद करना ईश्वर का दोष नहीं, आपकी अपनी नासमझी है।

अब सबसे बड़ा सवाल—इस व्यवस्था से हमारा तालमेल क्यों बिगड़ा हुआ है?

ज़रा आँखें खोलकर देखिए। बगीचे का वह फूल, आकाश का बादल, सूरज, नदियां और पहाड़—क्या इनमें से कोई परेशान है? क्या इनमें से कोई रंज, अवसाद, कसक, पीड़ा या किसी ग्लानि के बोझ तले दबा है? बिल्कुल नहीं। पूरी प्रकृति बिना किसी शिकायत के, ईश्वरीय विधान के साथ मजे से पूर्ण तालमेल में जी रही है। फिर आपको क्या हुआ है?

फिर यह विडंबना सिर्फ आपके साथ ही क्यों? आप, जो इस सृष्टि की सबसे श्रेष्ठ कृति हैं, जो नित्य, शुद्ध और साक्षात ब्रह्म का ही स्वरूप हैं—आप इतने अशांत, व्यग्र, डरे हुए और उदास उदास क्यों हैं? कारण बहुत सीधा और स्पष्ट है: आपका मूल उद्देश्य क्या था, और आप कर क्या रहे हैं?

आपको तो अपना परलोक सुधारना था इस बार। आपको उस परम पूर्णता को छूना था, अनंतता का स्वाद चखना था, और जीवन में अपनी सच्ची सार्थकता और श्रेष्ठता को सिद्ध करना था। आत्मा की यह यात्रा बहुत विराट थी। लेकिन आप जिस दिशा में दौड़ रहे हैं, वहाँ से यह कभी प्राप्त नहीं होने वाली। और मुझे लगता है आपको इस बात का थोड़ा बहुत आभास भी है।

सच कहूँ तो आपको जाना उत्तर था, और कदम दक्षिण की ओर बढ़ा रहे हैं—और विडंबना यह कि सब कुछ जानते-बूझते 🫣 अब यह भटकाव बंद कीजिए। जिस पूर्णता, आनंद, मोक्ष, सार्थकता और श्रेष्ठता की आपको तलाश है, वह अस्तित्व के शाश्वत नियम से ताल मिलाने में ही है। मनुष्य होने के नाते, अपने जीवन-यापन और घर-संसार के लिए आप जो कुछ भी करें, उसे ऐसे कीजिए मानो इस वक्त पूरे ब्रह्मांड का सबसे श्रेष्ठ कार्य आपके ही हाथों हो रहा हो—न कि कोई नीच या हीन काम। जब आपका हर कर्म प्रार्थना बन जाता है, तो यह जीवन भी महक उठता है और आगे का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है।

अब यह भटकाव बंद कीजिए। जिस पूर्णता, आनंद, मोक्ष, सार्थकता और श्रेष्ठता की आपको तलाश है, वह अस्तित्व के शाश्वत नियम से ताल मिलाने में ही है। मनुष्य होने के नाते, अपने जीवन-यापन और घर-संसार के लिए आप जो कुछ भी करें, उसे ऐसे कीजिए मानो इस वक्त पूरे ब्रह्मांड का सबसे श्रेष्ठ कार्य आपके ही हाथों हो रहा हो—न कि कोई तुच्छ या हीन काम। जब आपका हर कर्म प्रार्थना बन जाता है, तो यह जीवन भी महक उठता है और आगे का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है।

मैं आज अपने आराध्य प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि आपकी चेतना इस गहरी मगर सरल बात को आत्मसात कर ले। आपके कदम सही दिशा की ओर मुड़ें, आपका हर कर्म प्रार्थना बन जाए और मन को वह परम सुकून मिले जिसकी तलाश में आप युगों से दौड़ रहे हैं। न केवल आपका यह जीवन सार्थकता और श्रेष्ठता को प्राप्त करे, बल्कि आपको असीम आत्मसंतुष्टि मिले और आपकी आत्मा अपनी चिर-प्रतीक्षित पूर्णता को छू ले।

आपका जीवन लौकिक और पारलौकिक—दोनों दृष्टियों से नित्य समृद्ध होता रहे एवं आप सदा स्वस्थ, शांत, आनंदित और सार्थक बने रहें – इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आपको सप्रेम नमस्कार 🙏

श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।

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